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पुण्यतिथि विशेष: ऊधम सिंह जिन्होंने की थी ड्वायर की हत्या

Fri, 31 Jul 2015 03:17 PM IST
Updated Fri, 31 Jul 2015 03:17 PM IST
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udham singh

'हमें ऊधम सिंह के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। पंजाब के बाहर बहुत ही कम लोग ऊधम सिंह के बारे में जानते हैं।' "वो जलियांवाला बाग में मौजूद थे जब गवर्नर ड्वायर ने वहां लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं, तो उनकी कहानी में हमें ये बड़ा दिलचस्प लगा।"

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यह कहना है डांस एंड म्यूजिक बैंड 'स्कवेंजर्स' के निखिल वासुदेवन ने। उन्होंने ऊधम सिंह की 75वीं पुण्यतिथि के मौके पर एक वीडियो बनाया है।

ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को गवर्नर माइकल ओ'ड्वायर की हत्या के आरोप में फांसी दे दी गई थी। वे किताब के अंदर बंदूक छुपाकर लंदन के कॉक्सटन हॉल में दाखिल हुए थे और उन्होंने ओ'ड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

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जानिए ऊधम सिंह के बारे में कुछ ख़ास बातें

udham singh

ऊधम सिंह का असली नाम शेर सिंह था। साल 1933 में उन्होंने पासपोर्ट बनाने के लिए 'ऊधम सिंह' नाम अपनाया। तीन साल की उम्र में ही ऊधम सिंह की मां का देहांत हो गया था। कुछ सालों बाद उनके पिता का भी देहांत हो गया। उनके बड़े भाई का नाम साधु सिंह था। ऊधम सिंह काफी मेहनती थे और साल 1919 में सेंट्रल यतीमखाना, अमृतसर में रहकर उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की।

वे 'गदर' पार्टी से जुड़े और उस वजह से बाद में उन्हें 5 साल की जेल की सजा हुई थी। जेल से निकलने के बाद उन्होंने अपना नाम बदला और पासपोर्ट बनाकर विदेश चले गए।

लाहौर जेल में ऊधम सिंह की मुलाकात भगत सिंह से हुई। ऊधम सिंह की लिखी चिट्ठियों में इसका जिक्र भी किया गया है। ऊधम सिंह ने पत्र में लिखा था, 'भगत सिंह मेरा प्यारा दोस्त है।'

किसी भी धर्म पर भरोसा नहीं करते थे ऊधम

udham singh

जलियांवाला बाग काडं के समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ'ड्वायर की हत्या के बाद लंदन में ऊधम सिंह पर मुकदमा चला। उन्होंने जेल से जितने भी पत्र लिखे वो सब 'मोहम्मद सिंह आज़ाद' के नाम से थे।

ऊधम सिंह किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखते थे। लंदन की जेल में ऊधम सिंह ने अपने अंतिम वक्त में किसी भी तरह की धार्मिक किताब न ही मांगी और न ही पढ़ी।

वारिस शाह की 'हीर': लंदन की जेल में अपने अंतिम दिनों में ऊधम सिंह ने अपने दोस्तों को एक खत लिखकर वारिस शाह की 'हीर' लाने को कहा ‌था। ऊधम सिंह अदालत में वारिस शाह की 'हीर' पर हाथ रखकर शपथ लेना चाहते थे।

ऊधम सिंह साल 1933 में पासपोर्ट बनने के बाद सबसे ज़्यादा घूमे। वे अफ्रीका के अलावा सोवियत संघ समेत कई यूरोपीय देश गए। देश के बाहर फांसी पाने वाले ऊधम सिंह दूसरे शख्स थे। उनसे पहले मदन लाल ढींगरा को कर्जन वाइली की हत्या के लिए साल 1909 में फांसी दी गई थी।

(ऊधम सिंह और भगत सिंह पर शोध करने वाले और जवाहर लाल नहेरू विश्वविद्यलय के पूर्व प्रोफ़ेसर चमन लाल से बातचीत पर आधारित)

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