गुजरात के मुसलमानों ने जीते संस्कृत के मेडल
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किसी मुसलमान को संस्कृत पढ़ते देख आश्चर्य हो सकता है, मुसलमान का संस्कृत में मेडल जीतना और अधिक आश्चर्य में डाल सकता है, लेकिन उस आश्चर्य का क्या जब गुजरात के दो मुसलिम स्टुडेंट्स ने संस्कृत में विशिष्टता प्राप्त की और मेडल जीते, वो गुजरात जिसके लिये कहा जाता है कि वहां का मुसलमान अभी तक सांप्रदायिक दंगों से उबर नहीं पाया है।
अंग्रेजी दैनिक अखबार इंडियन एक्सप्रेस में अहमदाबाद से छपी खबर के अनुसार गुजरात विश्वविद्यालय के दो मुसलिम स्टुडेंट्स ने संस्कृत विषय में बेहतरीन अंक लाकर तीन मेडल हासिल किए। दोनों को ही यह मेडल बीए संस्कृत में उच्च अंक प्राप्त करने के लिए मिला है।
विजेताओं में दो मेडल पाने वाले तैयब शेख हैं, जो देवगड़ बरीया में पंचशील जिले के वाई एस आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज के छात्र हैं। एक मेडल पाने वाली यासीमबानु कोठारी राज्य के आदिवासी क्षेत्र के संतरामपुर में आदिवासी आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज की छात्रा हैं।
तैयब शेख ने 75.5 प्रतिशत और यासमीबानु कोठारी ने 68.5 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं। उन्हें ये मेडल दीक्षांत समारोह के दौरान दिये गये।
पढ़ाना चाहते हैं संस्कृत दोनों ही विजेता संस्कृत की पढ़ाई को यहीं तक सीमित नहीं करना चाहते। दोनों का ही कहना है कि वे संस्कृत में मास्टर डिग्री करना चाहते हैं और संस्कृत में ही पढ़ाना चाहते हैं।
शेख ने बताया कि शिक्षण में प्रशिक्षित होने के बाद वे प्राथमिक विद्यालय में नौकरी प्राप्त नहीं कर पाये थे। तब उन्होंने मुख्य विषय के तौर पर संस्कृत विषय से स्नातक कोर्स करने का निर्णय किया। अब शेख संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहते हैं और इसी विषय में आगे पढ़ाने भी चाहते हैं। यासमीनबानु ने भी बताया कि वह भी संस्कृत में मास्टर करना और पढ़ाना चाहती हैं।
घर में नहीं हुआ विरोध अपनी जीत को लेकर दोनों ही विजेताओं का कहना है कि संस्कृत पढ़ने के लिये उनके घर में कभी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा बल्कि परिजनों ने हमेशा उन्हें प्रोत्साहित किया है।
दो मेडल जीतने वाले शेख की उम्र 23 साल है और वे अभी गोधरा कॉलेज से बीएड कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे संस्कृत पढ़ने को लेकर बचपन से ही उत्साहित थे। टोकारवा गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान रामायण और महाभारत की कहानियों से उन्हें संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा मिली।
अपने घर के विषय में शेख ने बताया कि संस्कृत पढ़ने को लेकर उनके घर में किसी भी तरह का विरोध नहीं हुआ। उनके माता पिता केवल चाहते थे कि उनका बेटा अच्छा प्रदर्शन करे और सफल हो। शेख के बड़े भाई प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर हैं।
यासमीबानु कोठारी ने बताया कि संस्कृत पढ़ने की इच्छा उनमें बारहवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान हुई। यासमीन के पिता फल विक्रेता हैं और वह स्वयं संतरामपुर के ही एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाती हैं।
यासमीबानु का कहना है कि संस्कृत को लेकर घर में कोई विरोध होने की बजाय मेरे पिता और उनके दोस्त रफीक शेख ने मुझे इसके लिये प्रोत्साहन ही दिया है।
इस संबंध में तैयब शेख के संस्कृत के अध्यापक जे आर मच्ची का कहना है की भाषा किसी विशेष समुदाय से जुड़ी हुई नहीं है। कोई भी व्यक्ति कोई भी भाषा सीख सकता है। भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर जे एस बंदूकवाला कहते हैं कि मुसलिम लड़के-लड़कियों का शिक्षा के अन्य क्षेत्रों की ओर रुख करना एक अच्छा संकेत है। प्रोफेसर बंदूकवाला गरीब मुसलिम विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिये प्रोत्साहित करने वाली संस्था से संबंधित एम एस विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रोफेसर हैं।