अदालत पहुंची 'टुंडे कबाबी' की लड़ाई, 50 करोड़ का दावा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नॉनवेज के शौकीन अक्सर कहते सुने जाते हैं कि अगर टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया? मुगलई खाने वाले यदि हैदराबादी बिरयानी का गुणगान करते हैं तो लखनऊ के टुंडे कबाब को भी नहीं भूलते। लखनऊ के अलावा भी कुछ शहरों में टुंडे के कबाब मिल जाते हैं। जितना प्रसिद्ध ये कबाब है उतनी ही प्रसिद्ध हैं इससे जुड़ी कहानियां और इसके प्रति दीवानगी के किस्से।
लेकिन अब 'टुंडे के कबाब' पर चल रहा विवाद कोर्ट तक पहुंच गया है। 'लखनऊ वाले टुंडे कबाबी' ने कोर्ट में 50 करोड़ का दावा किया है जिस पर 'टुंडे कबाबी' कोर्ट में अपना पक्ष रखेंगे।
खबर के मुताबिक 'लखनऊ वाले टुंडे कबाबी' के नाम से दुकानों की चेन चलाने वाले मोहम्मद मुस्लिम ने कोर्ट में 50 करोड़ का दावा पेश किया है। अब इस पर दूसरे पक्ष 'टुंडे कबाबी' के संचालक मोहम्मद उस्मान का पक्ष सुनने के लिए 27 सितंबर की तारीख तय की है।
दोनों ही पक्षों के मुताबिक 'असली टुंडे कबाबी' वही हैं और कबाब की इस विरासत पर उन्हीं का हक है। अब ऐसे में देखना ये होगा कि कोर्ट 'कबाब की विरासत' किस पक्ष को सौंपेगी या फिर कोई बीच का रास्ता भी निकाला जा सकता है?
टुंडे कबाब: दोनों ही पक्ष बताते हैं अपना
फोन पर बात करते हुए 'टुंडे कबाबी' के संचालक मोहम्मद उस्मान बेहद गर्म हो गए। उन्होंने बताया कि मोहम्मद मुस्लिम उनके दूर के रिश्तेदार हैं, सऊदी अरब से आकर उन्होंने 'लखनऊ वाले टुंडे कबाबी' के नाम से कारोबार शुरु किया था। हमने उनके खिलाफ कोर्ट में मानहानि का भी मुकदमा कर रखा है।
उन्होंने बताया,"मेरे पास टुंडे का पेटेंट है, मैं पहले भी केस जीत चुका हूं, हाईकोर्ट में मामला चल रहा है, यहां फैसला कुछ भी हो असली फैसला ऊपरवाले की अदालत में होता है। हमने लखनऊ के स्वाद को आगे बढ़ाया, पुरखों का नाम बढ़ाया, यही बहुत है। सच्चाई सब जानते हैं।"
ठेठ अवधी अंदाज में वह बताते हैं कि,"दादा जी मुराद अली ने नुस्खा मेरे पिता रईस अहमद को दिया और उन्होंने मुझे। मात्र तीन ब्रांच पर हम खानदानी काम करते हैं, फ्रेंचाइजी नहीं बेचते।
वहीं दूसरी ओर 'लखनऊ वाले टुंडे कबाबी' के संचालक मोहम्मद मुस्लिम को कई बार फोन किया गया लेकिन उनका फोन नहीं उठा। हालांकि उनके पक्ष के मुताबिक उनका दावा है कि वे मुराद अली उर्फ टुंडे कबाबी के सगे नाती हैं और इस नाते इस टाइटल और विरासत पर उनका अधिकार है।
टुंडे कबाब की कहानी
टुंडे के कबाबों में आखिर खास क्या है? ये कबाब इतने मशहूर क्यों हैं? बड़े बड़े नेता और सितारे भी इसके दीवाने क्यों हैं? यदि इन सभी सवालों के जवाब जानने हैं तो लखनऊ जाना होगा लेकिन यहां हम आपको इस कबाब की कहानी तो सुना ही सकते हैं।
कहा जाता है कि टुंडे खानदान करीब 200 साल पहले भोपाल से आया था। ये लोग भोपाल के नवाब के बावर्ची थे। नवाब खाने के शौकीन थे लेकिन बुढापे में नॉनवेज नहीं खा पाते थे। उनकी मांग पर मांस को बारीक पीस कर, मसाला मिलाकर ऐसा बनाया गया कि वो आसानी से खा सकें।
स्वाद बाकी लोगों को भी ऐसा भाया कि देखते ही देखते इसके चर्चे चारों ओर होने लगे। कबाब बनाने में भैंसे और बकरे दोनों के मांस का इस्तेमाल किया जाता है। कहा जाता है कि टुंडे के कबाबों में करीब 100 तरह के मसालों का प्रयोग किया जाता हैं जिनमें से कुछ मसाले ईराक और अन्य देशों से भी आते हैं।
हाजी मुराद अली का हाथ बचपन में पतंग उड़ाते हुए टूट गया था जिसे बाद में काटना पड़ा। वह दुकान पर बैठते थे और उन्हीं के कारण धीरे धीरे दुकान 'टुंडे कबाबी की दुकान' के नाम से मशहूर होती चली गई।