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गंदगी साफ करने वाले सुनील के पास हैं चार-चार डिग्री

Thu, 27 Aug 2015 07:14 PM IST
Updated Thu, 27 Aug 2015 07:14 PM IST
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Trapped in the gutter: The street cleaner with four degrees

सिर्फ अच्छी तालीम हासिल कर लेने से आपके ख्वाब पूरे नहीं हो जाते हैं। कई बार आपके ख्वाबों के सामने दीवार बनकर आपकी पिछली जिंदगी खड़ी हो जाती है। शायद ऐसा ही कुछ सुनील जैसों के साथ होता है।

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सुनील यादव की उम्र 36 साल है और वो मायानगरी मुंबई में रहते हैं। उनका विश्वास है एजुकेशन के जरिए ही बड़े बदलाव किये जा सकते हैं। पर सुनील की कहानी यही पर थोड़ी अलग हो जाती है और अच्छी एजुकेशन भी समाज में उन्हें एक अच्छी नौकरी दिलवा पाने में असमर्थ है।
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बीबीसी के मुताबिक सुनील के पास इस समय चार-चार डिग्रियां हैं। इसमें से एक डिग्री सुनील ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से अपनी पोस्ट ग्रेजुएट लेवल के पढ़ाई पूरी कर पाई है। पर समाज में आज भी उसकी पहचान एक मैला बटोरने वाले के रूप में होती है। सुनील आज भी हाथ से मैला उठाने का काम करते हैं।
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अधिकतर यह काम दलित समुदाय के लोग करते हैं जिन्हें आज भी समाज में अछूत माना जाता है। एक दलित व्यक्ति के मुताबिक सुनील, डॉ.भीमराव आंबेडकर से प्रेरित हैं जिन्होंने कहा था कि सिर्फ एजुकेशन ही बदलाव ला सकती है।

पढ़-लिख कर क्या करेगा?

Trapped in the gutter: The street cleaner with four degrees

सुनील यादव की पढ़ाई जैसे व्यर्थ ही जा रही है। अपनी डिग्रियों की बदौलत भी ग्रेटर मुंबई के नगर निगम (एमसीजीएम) में उन्हें प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है।

सुनील अब दिन भर अपनी पढ़ाई करते हैं और रात में शहर की गंदगी साफ करने का काम करते हैं। नियमों के मुताबिक सुनील को पढ़ाई करने  के लिए अपने ऑफिस से वैसे ही छुट्टी मिल जानी चाहिए जैसे कि दूसरे कर्मचारियों को मिल जाती है। पर उसके ऑफिस ने उनकी पढ़ाई के लिए मांगी गई छुट्टी के आवेदन को खारिज कर दिया है।

सुनील ने बताया कि अधिकारी ने उससे कहा कि अगर वो उसे पढ़ाई करने के लिए छुट्टी देता है तो दूसरे कर्मचारियों को भी पढ़ाई करने के लिए छुट्टी देनी पड़ेगी।

अधिकारी ने उससे यहां तक पूछ डाला की वो पढ़-लिख कर क्या करेगा? सुनील के मुताबिक प्रशानिक तंत्र हमारे साथ गुलामों सा बर्ताव करता है। हर बार पढ़ाई करने के लिए छुट्टी मांगने पर सुनील को परेशान किया जाता है। अपनी परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिए महीने भर विरोध करने के बाद सुनील को छुट्टी मिल पायी थी।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा को देश में वर्ष 2013 में ही प्रतिबंधित

Trapped in the gutter: The street cleaner with four degrees

मुंबई नगर निगम को देश की सबसे संपन्न लोकल गवर्नमेंट वाला संग़ठन माना जाता है। यहां काम से काम 28,000 सफाई कर्मचारी और 15,000 अनुबंधित श्रमिक काम करते हैं। हाथ से मैला ढोने की प्रथा को देश में वर्ष 2013 में ही प्रतिबंधित कर दिया गया था।

पर समाजसेवियों के मुताबिक अभी भी इस काम में 10,000 से ज्यादा लोग लगे हुए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने जब इस बाबत वरिष्ट अधिकारियों से बात की तो उन्होंने बताया कि हाथ से मैला ढोने पर जो कानून वर्ष 2013 बना था उससे पूरी तरह से राज्य में लागू नहीं किया जा सका है।

मैला ढोने वाले श्रमिकों के संगठन के महासचिव मिलिंद रानाडे ने बीबीसी को बताया कि म्युनिसिपल काउंसिल मैला धोने वाले लोगों की परिभाषा को लेकर हमारे साथ खेल कर रही है। उन्होंने बताया कि गन्दगी साफ करने के लिए झाडू या अन्य चीजों का इस्तेमाल करते हैं और यही पर काउंसिल हमें टेक्निकल रूप से परेशान करती है।

सुनील को यह काम उनके पिता से मिला

Trapped in the gutter: The street cleaner with four degrees

अगस्त 2014 में ह्यूमन राइट वाच ने इस मुद्दे को महाराष्ट्र सरकार के सामने उठाया था कि स्थानीय अधिकारी सुनिश्चित करें कि ऐसा कोई भी काम नहीं किया जा रहा है जो कानून के खिलाफ हो।

सुनील को यह काम उनके पिता से मिला है जो पहले मैला ढोने का काम करते थे। इस काम में भी आज भी बहुसंख्यक रूप से दलित समुदाय के लोग जुड़ें हुए हैं। बहुत से कामगारों ने समय के हिसाब से अच्छी पढ़ाई कर ली है पर आज भी जबरदस्ती उन्हें मैला धोने का काम ही करना पड़ रहा हैं क्योंकि उन्हें और कुछ करने नहीं दिया जा रहा है।

वर्ष 2014 में सुनील ने लेबर वेलफेयर ऑफिसर की पोस्ट के लिए आवेदन किया था। पर टेक्निकल ग्राउंड पर उनका सिलेक्शन नहीं किया गया। सुनील ने कहा कि उन्हें समझ में नहीं आता जिस पद के लिए हम लोग योग्य हैं उस पद के लिए हमें पदोन्नत क्यों नहीं किया जाता है।

उनका प्रमोशन क्यों नहीं किया जा रहा?

Trapped in the gutter: The street cleaner with four degrees

ये कहानी सिर्फ सुनील की नहीं है। बल्कि बहुत से दूसरे लोग भी अपने हक लिए लड़ रहे हैं। मुंबई म्युनिसिपल संघ के 11 कर्मचारियों ने इंडस्ट्रियल लेबर कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर प्रश्न उठाया है कि उनका प्रमोशन क्यों नहीं किया जा रहा है। अभी भी वो मामला लंबित पड़ा हुआ है।

41 वर्षीय प्रमोद जाधव स्वीपर के पद पर म्युनिसिपेलिटी में काम करते हैं ने दो साल पहले राजनीती विज्ञान में परास्नातक की परीक्षा पास की है। प्रमोद बताते हैं कि मैंने बड़े पदों के लिए आवेदन किया है पर मुझे कोई उम्मीद नहीं है। नियमों के मुताबिक जो लोग परास्नातक की परीक्षा पास कर लेते हैं उनको इन्क्रीमेंट मिलना चाहिए।

पर प्रमोद के सीनियर ने उन्हें लिख कर दे दिया की चौथे दर्जे के कर्मचारी को इन्क्रीमेंट देना सही नहीं है। डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर प्रकाश पाटिल ने बताया कि यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा रहा है। उनको तब प्रमोशन मिल जायेगा जब वो रिक्रूटमेंट रूल्स को पूरा कर लेंगे।

दलित चिंतक और पॉलिटिकल कमेंटेटर चंद्र भान प्रसाद का कहना है कि जब तक वंचित समाज के लोग ऐसे ही म्युनिसिपेलिटी में काम करते रहेगें तब तक उन्हें ऐसी ही गुलामी का शिकार होना पड़ेगा। अब समय आ गया कि अपनी जाति से अलग हटकर काम में लगा जाए। अलग हट कर काम करने से बने बनाए सिस्टम को तोड़ा जा सकता है।

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