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अब सरल भाषा में समझाया जाएगा खुत्बा
विजय जैन/इमरान अली/दिल्ली
Updated Sat, 09 Mar 2013 01:36 PM IST
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बहुत जल्दी जुमे की नमाज के बाद इमाम खुत्बे को उर्दू या आम बोलचाल की भाषा में लोगों को समझाना शुरू कर देंगे। इस समय खुत्बा अरबी भाषा में होता है और बहुत से लोगों को इसका अर्थ समझ में नहीं आता लेकिन दिल्ली के एक स्वयंसेवी संगठन ने पहल की है कि मौलवियों को प्रशिक्षण दिया जाए जिससे वे आसान भाषा में खुत्बे का अर्थ भी समझा सकें। जल्दी ही प्रशिक्षण का ये काम दिल्ली में भी शुरू होने जा रहा है।
उत्तरप्रदेश के मौलवियों ने भी इसका स्वागत किया है। खुत्बे में इमाम खुत्बा सुनाते हैं, जिसमें अल्लाह के नबी द्वारा बयान की गईं हदीसों का उल्लेख किया जाता है।
पहल
दिल्ली के स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मस्जिदों में खुत्बे का उर्दू अनुवाद सुनाए जाने की मुहिम चलाई है।
एनजीओ के वाइस प्रेसीडेंट एसएम शकील ने अमर उजाला से हुई बातचीत में कहा कि जुमे की नमाज से पहले होने वाला खुत्बा तो अरबी में ही पढ़ा जाएगा, क्योंकि शरई तौर पर इसका ही हुक्म दिया गया है। लेकिन अब इसका उर्दू में अनुवाद भी सुनाया जाएगा।
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उनका कहना है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अनुवाद की व्यवस्था अभी भी है लेकिन अब इसे मुंबई और दिल्ली सहित उत्तर भारत के राज्यों में भी शुरू किया जाएगा। उनका कहना है सभी जामा मस्जिदों में ऐसी व्यवस्था कराए जाने की मुहिम चलाई गई है कि इमाम खुत्बे से पहले उसका अनुवाद जरूरी तौर पर बयान करें।
एनजीओ जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डायरेक्टर डा. सैय्यद जफर महमूद का कहना है, "एक साल में देखा जाए तो 52 या 53 शुक्रवार आते हैं। औसत की बात की जाए तो ऐसे में एक मुसलमान अपनी जिंदगी में 4000 बार शुक्रवार का खुत्बा सुनता है। गैर अरब देशों में रहने वाले ज्यादातर मुस्लिम खुत्बे में दिए मैसेज का अर्थ नहीं समझ पाते, क्योंकि खुत्बा अरबी जुबान में होता है। उन्होंने संस्था में वरिष्ठ इस्लामिक स्कॉलर्स को शामिल किया है जो कि ऐसे इमामों को ट्रेनिंग देंगे, ताकि नमाजियों को खुत्बे के भावार्थ का पता चल पाए।"
अब दिल्ली में भी होगी ट्रेनिंग
अभी हाल ही संस्था ने मुंबई में ट्रेनिंग शिविर लगाकर इमामों को इसकी तालीम दी थी। अब दिल्ली में ये शुरू होने जा रहा है। अप्रैल को लगने वाले इस ट्रेनिंग शिविर में 30 इमाम भाग ले सकते हैं। एनजीओ का कहना है कि ट्रेनिंग लेने के इच्छुक इमाम imams@zakatindia।com पर आवेदन दे सकते हैं।
यूपी के उलेमाओं ने किया स्वागत
पंचशीलनगर के गढ़ शहर काजी मौलाना हाजी सैयद कसीमुद्दीन कहते हैं "खुत्बा तो अरबी जुबान में ही सुनाया जाने की शरई बंदिश है, लेकिन इमाम का फर्ज बनता है कि वह खुत्बे से पहले उर्दू जुबान में उसका अनुवाद नमाजियों को समझा दे। एनजीओ की मुहिम काफी अच्छी पहल है।"
जामा मस्जिद चौपला के पेश इमाम हाफिज मुहम्मद अली का कहना है कि खुत्बे में कोई भी बदलाव किया जाना शरई तौर पर जायज नहीं है, क्योंकि इस दौरान कुरान पाक की तिलावत, नमाज और तस्बीह पढ़ाना भी साफ तौर पर मना है। उनका कहना है, "खुत्बे से पहले इमाम अपनी तकरीर के दौरान उस पर उर्दू जुबान में रोशनी डालते हैं, लेकिन जिन मस्जिदों में ऐसा नहीं होता है, वहां के नमाजियों के लिए एनजीओ की पहल अच्छी है।"
क्या है खुत्बा
अल्लाह के नबी ने अपनी कौम से समय समय पर जो खिताब किया था, उसे जुमे की नमाज से पहले शुक्रवार को जामा मस्जिदों में पेश इमाम खुत्बे के रूप में सुनाते हैं। दूसरे शब्दों में अल्लाह के नबी द्वारा बयान की गईं हदीसों का उल्लेख खुत्बे में किया जाता है। खुत्बे का बयान अरबी भाषा में होता है, जिससे अधिकांश नमाजी उसका भावार्थ समझने में पूरी तरह नहीं समझ पाते हैं।
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उत्तरप्रदेश के मौलवियों ने भी इसका स्वागत किया है। खुत्बे में इमाम खुत्बा सुनाते हैं, जिसमें अल्लाह के नबी द्वारा बयान की गईं हदीसों का उल्लेख किया जाता है।
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पहल
दिल्ली के स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मस्जिदों में खुत्बे का उर्दू अनुवाद सुनाए जाने की मुहिम चलाई है।
एनजीओ के वाइस प्रेसीडेंट एसएम शकील ने अमर उजाला से हुई बातचीत में कहा कि जुमे की नमाज से पहले होने वाला खुत्बा तो अरबी में ही पढ़ा जाएगा, क्योंकि शरई तौर पर इसका ही हुक्म दिया गया है। लेकिन अब इसका उर्दू में अनुवाद भी सुनाया जाएगा।
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उनका कहना है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अनुवाद की व्यवस्था अभी भी है लेकिन अब इसे मुंबई और दिल्ली सहित उत्तर भारत के राज्यों में भी शुरू किया जाएगा। उनका कहना है सभी जामा मस्जिदों में ऐसी व्यवस्था कराए जाने की मुहिम चलाई गई है कि इमाम खुत्बे से पहले उसका अनुवाद जरूरी तौर पर बयान करें।
एनजीओ जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डायरेक्टर डा. सैय्यद जफर महमूद का कहना है, "एक साल में देखा जाए तो 52 या 53 शुक्रवार आते हैं। औसत की बात की जाए तो ऐसे में एक मुसलमान अपनी जिंदगी में 4000 बार शुक्रवार का खुत्बा सुनता है। गैर अरब देशों में रहने वाले ज्यादातर मुस्लिम खुत्बे में दिए मैसेज का अर्थ नहीं समझ पाते, क्योंकि खुत्बा अरबी जुबान में होता है। उन्होंने संस्था में वरिष्ठ इस्लामिक स्कॉलर्स को शामिल किया है जो कि ऐसे इमामों को ट्रेनिंग देंगे, ताकि नमाजियों को खुत्बे के भावार्थ का पता चल पाए।"
अब दिल्ली में भी होगी ट्रेनिंग
अभी हाल ही संस्था ने मुंबई में ट्रेनिंग शिविर लगाकर इमामों को इसकी तालीम दी थी। अब दिल्ली में ये शुरू होने जा रहा है। अप्रैल को लगने वाले इस ट्रेनिंग शिविर में 30 इमाम भाग ले सकते हैं। एनजीओ का कहना है कि ट्रेनिंग लेने के इच्छुक इमाम imams@zakatindia।com पर आवेदन दे सकते हैं।
यूपी के उलेमाओं ने किया स्वागत
पंचशीलनगर के गढ़ शहर काजी मौलाना हाजी सैयद कसीमुद्दीन कहते हैं "खुत्बा तो अरबी जुबान में ही सुनाया जाने की शरई बंदिश है, लेकिन इमाम का फर्ज बनता है कि वह खुत्बे से पहले उर्दू जुबान में उसका अनुवाद नमाजियों को समझा दे। एनजीओ की मुहिम काफी अच्छी पहल है।"
जामा मस्जिद चौपला के पेश इमाम हाफिज मुहम्मद अली का कहना है कि खुत्बे में कोई भी बदलाव किया जाना शरई तौर पर जायज नहीं है, क्योंकि इस दौरान कुरान पाक की तिलावत, नमाज और तस्बीह पढ़ाना भी साफ तौर पर मना है। उनका कहना है, "खुत्बे से पहले इमाम अपनी तकरीर के दौरान उस पर उर्दू जुबान में रोशनी डालते हैं, लेकिन जिन मस्जिदों में ऐसा नहीं होता है, वहां के नमाजियों के लिए एनजीओ की पहल अच्छी है।"
क्या है खुत्बा
अल्लाह के नबी ने अपनी कौम से समय समय पर जो खिताब किया था, उसे जुमे की नमाज से पहले शुक्रवार को जामा मस्जिदों में पेश इमाम खुत्बे के रूप में सुनाते हैं। दूसरे शब्दों में अल्लाह के नबी द्वारा बयान की गईं हदीसों का उल्लेख खुत्बे में किया जाता है। खुत्बे का बयान अरबी भाषा में होता है, जिससे अधिकांश नमाजी उसका भावार्थ समझने में पूरी तरह नहीं समझ पाते हैं।