अजमल कसाब की फांसी से जुड़े कुछ अहम तथ्य

विजय जैन/नई दिल्ली Updated Thu, 22 Nov 2012 10:19 AM IST
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पाक आतंकी अजमल कसाब अपनी कैद की पूरी अवधि के दौरान ‘सी-7096’ के नाम से जाना गया। यहां तक कि फांसी के लिए आधिकारिक फाइल में भी उसे इसी नाम से अंकित किया गया। कसाब की गतिविधियों और मूवमेंट को हमेशा काफी गोपनीय रखा गया।

राष्ट्रपति द्वारा कसाब की दया याचिका खारिज किए जाने के बाद उसको फांसी दिए जाने के संदर्भ में आधिकारिक दस्तावेज में भी उसकी पहचान यही नंबर था। कसाब को यह नंबर आर्थर रोड जेल में अधिकारियों द्वारा दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक, मुंबई से पुणे की यरवडा जेल शिफ्ट किए जाने के दौरान भी उसके मूवमेंट के बारे में जानकारी के लिए इसी नंबर का इस्तेमाल किया गया।

मुंबई के जख्म और कसाब के अंत का दिन भी रहा बुधवार
मुंबई हमलों के दोषी कसाब को बुधवार सुबह फांसी दे दी गई और यह भी संयोग ही है कि 2008 के 26 नवंबर की काली रात को जब 10 पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया था तो उस दिन भी बुधवार था। इस हमले में आतंकियों ने 166 निर्दोष लोगों की जान ले ली थी। तब कसाब ही एक मात्र आतंकी था तो जीवित पकड़ा गया। उसे फांसी के फंदे पर ले जाने में भी चार साल लग गये और जब 21 नवंबर 2012 को उसे सूली पर चढ़ाया गया तो यह दिन भी बुधवार ही था।

बीस साल बाद यरवडा जेल फिर चर्चा में
मुंबई के आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब को पुणे की यरवडा जेल में फांसी दिए जाने के बाद यह जेल 20 साल बाद फिर सुर्खी में आ गई है। ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान सेनाध्यक्ष रहे जनरल एएस वैद्य के हत्यारों हरजिंदर सिंह जिंदा और सुखदेव सिंह सुक्खा को इसी जेल में 9 अक्टूबर 1992 को फांसी दी गई थी। फांसी दिए जाने के बाद कसाब को यरवडा जेल में ही दफना दिया गया, जबकि सुक्खा और जिंदा का इसी जेल के पास एक छोटी सी नदी के किनारे अंतिम संस्कार कर अस्थियां नदी में बहा दी गई थीं।

समुद्र में दफनाने का भी था विचार
अधिकारियों के विचार विमर्श के दौरान एक बार यह बात भी सामने आई थी कि कसाब को आतंकी आसोमा बिन लादेन की तरह ही समुद्र में दफनाया जाए, जहां किसी को उसका निशान न मिले। मीडिया के कुछ सूत्रों द्वारा यह बात कही गई। लेकिन अंत में यह इरादा त्याग दिया गया और कसाब को यरवडा जेल में दफनाया गया।

यूपी से मांगा गया था जल्लाद
पाक आतंकी अजमल आमिर कसाब को फांसी देने वालों की सूची में यूपी के इकलौते जल्लाद अब्दुल्ला का भी नाम था। महाराष्ट्र के गृह विभाग ने यूपी से जल्लाद मांगा था, लेकिन अब्दुल्ला को कसाब को फांसी देने के लिए भेजा गया या नहीं, इसे बेहद गोपनीय रखा गया है। प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव ने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है कि यूपी से जल्लाद भेजा गया था या नहीं।

कसाब को बता दी गई थी फांसी की तारीख
आतंकी अजमल कसाब को उसे फांसी दिए जाने की तारीख मुंबई के सेंट्रल जेल से पुणे पहुंचाने के पहले ही बता दी गई थी। साथ ही उससे ‘डेथ वारंट’ पर दस्तखत भी कराए गए गए थे। जेल अधिकारियों के अनुसार एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसे उसकी जेल की कोठरी में वारंट पढ़ कर सुनाया था और बताया कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दया याचिका खारिज कर दी है।

गार्ड करते रहे खाली कोठरी की रखवाली
कसाब को मुंबई से पुणे के यरवडा जेल ले जाने और फांसी दिए जाने की योजना इतनी गुप्त रखी गई कि उसकी कोठरी की रखवाली कर रहे सिपाहियों को भी कुछ नहीं बताया गया। इंडियन तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के दो सौ रक्षक मार्च 2009 से कसाब की कोठरी के बाहर तैनात थे और कसाब को मुंबई से ले जाने के बावजूद वे खाली कोठरी की रखवाली करते रहे। यही नहीं जिस जल्लाद ने उसे फांसी पर लटकाया, उसे भी नहीं बताया गया था कि किसे वह लटकाने जा रहा है।

चीनी मीडिया ने कसाब की फांसी को दी प्रमुखता
चीन की सरकारी मीडिया में अजमल कसाब को फांसी पर लटकाए जाने की खबर को व्यापक रूप से कवर किया गया है। मीडिया ने कसाब को पाकिस्तानी आतंकवादी बताया है। सरकारी टेलीविजन ने इसे ब्रेकिंग स्टोरी के रूप में चलाया जबकि सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ और सभी सरकारी समाचार पत्रों की वेबसाइटों में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया।

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