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ये 5 मुश्किलें बिगाड़ सकती हैं भाजपा, आप, कांग्रेस की चाल

Tue, 03 Feb 2015 01:26 PM IST
Updated Tue, 03 Feb 2015 01:26 PM IST
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5 respective challenges for AAP, BJP and Congress in Delhi Elections 2015

दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार चरम पर है। भाजपा और आप के बीच सत्ता संघर्ष की लड़ाई है और कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है।  दांव चल रहे हैं। आरोप प्रत्यारोप चल रहे हैं, वार हो रहे हैं।

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प्रचार के इस दौर में भाजपा की कमान वापस नरेंद्र मोदी के हाथों में हैं तो आप का रथ पर केजरीवाल सवार हैं। कांटे की इस लड़ाई में भाजपा आप और कांग्रेस को कई दिक्कतों को सामना करना पड रहा है। पढ़िए ऐसे तीनों दलों के सामने ऐसे पांच तथ्य।
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भाजपा की पांच समस्याएं

1- दिल्ली भाजपा के अंदरूनी विवाद और नेताओं का एक न होना और पुराने नेताओं के किरण बेदी के नाम पर खुलकर सामने न आना भाजपा के लिए दिक्कत पैदा कर सकता है। बीच-बीच में मनमुटाव की खबरें आती रही। भाजपा के प्रचार में भाजपा संगठन पूरी क्षमता से नहीं दिख रहा है। नेताओं के भ्रामक बयान भी बीच बीच में आते रहे। किरण बेदी की सभाओं में अपेक्षित भीड़ न जुटने से भाजपा में चिंता बढ़ी है।
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उनकी प्रशासनिक योग्यता और अनुभव मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है। लेकिन किरण बेदी के प्रचार की शैली और अब तक दिए वकतव्यों का कोई बड़ा असर नहीं दिखा है। किरण बेदी लोगों को आश्वस्त नहीं करा पाई हैं कि भले भाजपा के उच्च स्तर पर उनके नाम की सहमती बनी हो, लेकिन दिल्ली स्तर पर उन्होंने सबको साथ ले लिया है।

2- आम आदमी पार्टी  एमसीडी से जुड़े इन मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। भाजपा को इन मुद्दों से जूझना पड़ रहा है। आप पार्टी नियमित पावर सप्लाई और सस्ती दर पर पीने का पानी मुहैया कराने, झुग्गी बस्तियों को नियमित करने, सड़कों की हालत बेहतर करने की बात कह रही है।

भाजपा इन मुद्दों पर अपनी राय रख रही है। लेकिन आप ने इन मुद्दों पर बहुत व्यवस्थित प्रचार किया है। म्यूनिसिपल कारपोरेशन में भाजपा का काम बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा। भाजपा अब नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग कर दिल्ली के विकास का आश्वासन दे रही है।

भाजपा के सामने ये आ सकती हैं दिक्‍कतें

5 respective challenges for AAP, BJP and Congress in Delhi Elections 2015

3- किरण बेदी को सामने लाने पर भाजपा को कुछ हद तक अपने वैश्य वोट खिसकने की आशंका है। भाजपा मान रही है कि किरण बेदी के आने से महिलाओं में उनके लिए रुझान हुआ है। भाजपा यही चाहेगी कि अल्पसंख्यक वोट आप के लिए केंद्रित न हो जाए।

अल्पसंख्यकों का रुझान इस बार आप पार्टी के लिए दिख रहा है। कांग्रेस  दिल्ली के चुनाव में सक्रिय हुई है। लेकिन कहना मुश्किल कि वह आप की ओर जाते अल्पसंख्यकों को कितना रोक पाएगी।

4- भाजपा ने पूर्वांचल और उत्तराखंड के लोगों को टिकट न देकर नाराज किया है। उत्तराखंड समुदाय के लोगों को केवल एक सीट मिली है। इस नाराजगी का असर ज्यादा नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस ने भी एक सीट दी है और आप पार्टी ने तो किसी भी उत्तराखंडी को टिकट नहीं दिया।

लेकिन हाल की परिस्थितियों में यह लग रहा था कि उत्तराखंडी लोग भाजपा के पक्ष में रुझान दिखा सकते थे। वह वोट करेंगे लेकिन उमड़ेंगे नहीं। उत्तराखंडियों के जो वोट बड़े स्तर पर भाजपा को मिल सकते थे, वह अब छिटके हुए रूप से मिलेंगे।

5- पहले दिल्ली चुनाव में भाजपा का कोई चेहरा न होना, फिर किरण बेदी को सामने लाना, इसके बाद फिर नरेंद्र मोदी की शरण में जाना, यह बार बार बदलती रणनीति बता रही है कि भाजपा के लिए दिल्ली इतनी सहज नहीं है। काफी कठिन लड़ाई लड़ी जा रही है।

भाजपा का जीतने का आधार यही होगा कि लोग नरेंद्र मोदी के ऊपर भरोसा करें कि दिल्ली का विकास वही कर सकते हैं या करा सकते हैं। आप के लिए यह माहौल बन सकता है कि देश भर में भाजपा को जिता दिया, दिल्ली में आप पार्टी को जिताकर देखते हैं।

'आप' के लिए पांच दिक्कतें

5 respective challenges for AAP, BJP and Congress in Delhi Elections 2015

1- मध्य वर्ग तेजी से आप से खिसका है। इससे आप का राज्य में फिर से सरकार बनाने का सपना बिखर सकता है। आप पार्टी नए वर्ग को जोड़ने की आप पार्टी ने खास पहल नहीं की। आप पार्टी की नकारात्मकता बनी हुई है। पार्टी से जुड़े लोग अपने पक्ष में नहीं, दूसरी पार्टियों पर ज्यादा बोल रहे हैं। दूसरों की कमियां गिना रहे हैं। यह बात आप के लिए अच्छा माहौल नहीं बना रही।

2- आप पार्टी का जो तेवर पिछले चुनाव में था, वह आभा कम हुई है। आप ने जिस तरह टिकट बांटे हैं और जिन लोगों को बांटे हैं वह मतदाताओं कोइस मामले में बहुत आश्वस्त नहीं कर रहे कि यह दूसरों से कोई अलग पार्टी है। चंदा लेने के लिए केजरीवाल की अमेरिका यात्रा, बीस हजार का लंच आफर जैसी बातों ने आप के लिए साफ सुधरा माहौल नहीं बनने दिया।

3- दिल्ली की सत्ता छोड़ने पर मतदाताओं का आप पार्टी के प्रति जो नकारात्मक धारणा बनी, उसे दूर करने के लिए आप पार्टी ने पूरी शक्ति लगाई। यहां तक कि आप पार्टी के प्रचार का खास गीत 'केजरीवाल पांच साल' इसी पर लक्ष्य रखा गया है।

रेडियो में भी केजरीवाल बार बार कह रहे हैं कि इस बार पांच साल से पहले सत्ता नहीं छोड़ेगे। लेकिन यह सवाल उनका पीछा नहीं छोड़ रहा। कहीं न कहीं आप इस सवाल से जूझ रही है। भाजपा ने भी इस पहलू पर काफी तूल दिया।

4- अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया दो प्रखर नेताओं के अलावा आप पार्टी में तीसरा बड़ा व्यक्तित्व नजर नहीं आता। पार्टी मतदाताओं को यह नहीं बता पा रही है कि उसने किन नए अच्छे व्यक्तित्वों को आप से जोड़ा। ज्यादातर खबरें पार्टी से निकलने वाले नेताओं की हैं। बीच में पूर्व केंद्रीय मंत्री शांतिभूषण का बयान, ने आप के लिए उलझन बढ़ाई।

5- आप के लिए असली अड़चन केंद्र में भाजपा और प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का होना है। मोदी की चार सभाएं हैं। और भाजपा आखिरी हफ्ते में पूरे जोर शोर से मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अपने प्रचार को झोंकने वाली है। इस स्थिति में भाजपा मतदाताओं को अपने भरोसे में लेने के लिए ज्यादा अवसर है। नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार के प्रति अभी लोगों का किसी भी तरह भरोसा नहीं टूटा है।

केंद्र पर आरोप लगाने के लिए आप पार्टी के पास ज्यादा ठोस मुद्दे नहीं है। ले देकर वह अपने उन्हीं मुद्दों पर फोकस कर रही है जिससे  पिछले चुनाव में सफलता मिली थी। पर पिछले समय और आज की स्थिति में थोड़ा फर्क है।  कांग्रेस जिस तरह पिछले एक हफ्ते से सक्रिय हुई है उससे भी आप की चिंता बड़ी है। कांग्रेस इन स्थितियों में भी जिस हद तक बढती जाएगी, आप के लिए उतनी दिक्कत बढ़ेगी।

कांग्रेस के लिए पांच विपरीत बातें

5 respective challenges for AAP, BJP and Congress in Delhi Elections 2015

1- चुनाव में कांग्रेस ने अजय माकन के तौर पर अपना चेहरा मतदाताओं के समक्ष रखा है। लेकिन कांग्रेस का प्रचार सुस्त है। उसमें उत्साह की कमी दिखती है। यह हारी हुई लड़ाई में थोड़ा बहुत पाने की लालसा जैसा है। इस माहौल को पाटने के लिए कांग्रेस खास नहीं कर पा रही है।

2- कांग्रेस को उम्मीद अल्पसंख्यक वोट पर रहती थी। इस बार अल्पसंख्यक रुझान आप की ओर दिख रहा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए खासी दिक्कत हो सकती है। अल्पसंख्यक यही मान कर आप को वोट देगा कि कांग्रेस तो जीत ही नहीं रही।

3- राहुल गांधी ने प्रचार अभियान संभाला है। लेकिन वह  अपने कौशल से चुनाव नहीं जिता पा रहे हैं। फिर दिल्ली में ऐसा क्या होगा कि लोग उनकी बातों को स्वीकार करें। दिल्ली में भाजपा की तरह कांग्रेस संगठन भी बिखरा हुआ है। नेताओं के आपसी द्वंद्व चरम पर हैं।

4- कांग्रेस ने इन सात महीनों में ऐसा कुछ नहीं किया कि लोगों का पार्टी के प्रति विश्वास लौटे। केवल टीवी पर  मनीष तिवारी के  दो या तीन पंक्तियों के बयान देने से पार्टी की सक्रियता नहीं समझी जा सकती। कांग्रेस इसी इंतजार में हैं कि कब मोदी सरकार कोई बड़ी गलती करे। लेकिन अपनी पार्टी को बचाने, फिर से तैयार करने में रुचि नहीं दिखती।

5- कांग्रेस शीर्ष स्तर पर भी झगड़ों से निपट नही पा रही है। एक नेता बयान देता है, दूसरा उसके विपरीत कहकर या उसका खंडन करता है। इससे पार्टी के अंदर मनोबल नहीं बढ़ रहा। जिस तरह लोकसभा में मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद ने चुनाव लड़ने से इंकार किया वैसे ही दिल्ली से कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने से इंकार करना पार्टी के हालात को अभिव्यक्त करता है।

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