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आए तो बड़े-बड़े सूरमा लेकिन विकास रहा दूर की कौड़ी

Wed, 26 Mar 2014 08:05 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 26 Mar 2014 08:05 AM IST
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there were big leaders but not big development

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे सूबे में भाजपा की बुरी गत हुई थी। तब पीलीभीत लोकसभा सीट के तहत आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ बीसलपुर से भाजपा के रामसरन वर्मा बड़े अंतर से जीते। लेकिन इनका वरुण और पूर्व सांसद मेनका गांधी से 36 का आंकड़ा है।

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पूछने पर तंज कसने के अंदाज में कहते हैं, यहां के सांसद दूसरे सांसदों की तुलना में अपनी जनता की अपेक्षा पर सबसे ज्यादा खरे उतरे हैं। इस बार के एजेंडे का सवाल करने पर उनका सुर बदला और बोले कि प्रत्याशी (मेनका गांधी) का एजेंडा तो वही जानें, पार्टी का पूछिए तो बताएं।
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नेता और उनके चुनावी तीर

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भाजपा की मेनका पहली बार 1989 में पीलीभीत से चुनाव लड़ीं। कुल छह चुनाव में वह पांच बार विजयी रहकर दो बार केंद्रीय मंत्री बनीं। वर्तमान में बरेली की आंवला सीट से सांसद मेनका का यह सातवां चुनाव है।

तरकश के तीर : ‘कांग्रेस ने महंगाई और भ्रष्टाचार से देश को लूटा है, देश को बचाना है तो भाजपा को लाओ’ के नारे के साथ मैदान में हैं। क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता बता रही हैं।

वहीं अनीस अहमद 1990 में बसपा में शामिल होने वाले और अनीस बीसलपुर के रहने वाले हैं। 1996, 2002 और 2007 में विधानसभा चुनाव जीते। तीनों बार राज्यमंत्री रहे। 2009 के लोकसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे थे।

तरकश के तीर : अनीस भाईचारा का नारा दे रहे हैं। स्थानीय प्रत्याशी चुनने से विकास होने का राग छेड़े हैं। भाजपा सांसदों के विकास को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।

कांग्रेस के संजय कपूर

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कांग्रेस के संजय कपूर रामपुर की विलासपुर सीट से विधायक और मंडल के प्रभारी भी हैं। जिले में उनका पहला चुनाव है।

तरकश के तीर : बदलाव लाने का नारा दिया है। ‘25 साल भाजपा को देखा’ के नारे के साथ भाजपा को घेरने की रणनीति।

लोगों का कहना है कि खेती, जंगल, नदियां बहुत कुछ है यहां। अगर कुछ नहीं है तो सियासत करने वालों की नीयत। सांसद कोई एक विकास का यादगार काम किए हों तो कोई गिना दे। जनता को भावनाओं में बहाकर खुद सदन में पहुंचने के अलावा यहां के सांसदों ने कभी कुछ नहीं किया।

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रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज बनता तो..

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मती नदी का उद्गम स्थल जो कभी पीलीभीत की पहचान हुआ करता था जो आज विलुप्त होने की कगार पर है। शहर की रफ्तार को ब्रेक लगाता जाम। नौगवां रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज बनता तो शायद शहर की रफ्तार बढ़ती। पर ओवरब्रिज की मांग बस मांगों की फेहरिस्त में शामिल होकर रह गई।

कोई नया कारखाना या उद्योग नहीं लगा। अलबत्ता मझोला की चीनी मिल बंद हो गई। सैकड़ों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। बांसुरी उद्योग ने भी दम तोड़ दिया। गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका और उनके बेटे वरुण को सिर माथे पर बिठाने वाला पीलीभीत सवाल कर रहा है।

जिले की चार और बरेली की बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र को मिलाकर बने पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो यहां सिर्फ दो बार स्थानीय निवासी सांसद चुने गए। 1977 में भारतीय लोकदल से मो. शमशुल हसन खान तो 1991 में भाजपा से परशुराम।

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