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हो सकता है नया सवेरा

Thu, 15 Aug 2013 08:10 PM IST
राकेश ओमप्रकाश मेहरा/चर्चित फिल्मकार
राकेश ओमप्रकाश मेहरा/चर्चित फिल्मकार Updated Thu, 15 Aug 2013 08:10 PM IST
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there may be new dawn

आज देश के हालात अच्छे नजर नहीं आते, तो इसकी जिम्मेदारी हम किसी एक के सिर नहीं मढ़ सकते। हम शीशे में देखेंगे, तो अपना ही चेहरा दिखेगा। शोर मचाना, नारेबाजी करना आसान है। मुश्किल काम अपनी खामियां ढूंढना है। हम व्यवस्था के अंग हैं। बारीकी से देखें, तो समाज हमसे ही बनता है।

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ईमानदार और पारदर्शी राजनीतिक व्यवस्था की मांग आज की नहीं है। हजारों साल पुरानी है। बाजार में कोई बीज नहीं मिलता कि आप ले आएं और बो दें, जिससे अच्छी राजनीति पैदा हो जाए। हमने अंग्रेजों से आजादी तो ले ली। लेकिन कहीं न कहीं अपने ही गुलाम बन गए। जो दीवाने आजादी के लिए लड़ रहे थे, जान दे रहे थे, उनके मन के किसी कोने में भी यह आशंका थी। वह डर आज सही साबित हो रहा है। गोरों का शोषण वास्तव में मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण था। यह आज भी दिखता है। जब तक यह खत्म नहीं होगा, तब तक सही मायनों में आजादी हमसे दूर है।
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जब मैंने रंग दे बसंती बनाई थी, तो वह मेरे अंदर का ही गुस्सा था कि मैंने अपने देश के लिए कुछ नहीं किया। मेरी पीढ़ी की बात करूं, तो जब हम कॉलेज जाया करते थे, तो बड़ी-बड़ी बातें करते थे। देश को बदलेंगे, भ्रष्टाचार को खत्म करेंगे। 1977 में जब आपातकाल खत्म हुआ, तब लगा कि अंधेरे से निकले हैं। रोशनी आई है। लेकिन वह कहीं न कहीं बातों में रह गई। हम देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी भूलकर छोटी सोच के साथ अपनी जिंदगी संवारने में लग गए कि नौकरी मिल जाए, शादी हो जाए, घर हो जाए। देश का वह युवा सो गया।
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मेरे हिसाब से इनसान की सबसे बड़ी चीज उसका चरित्र होता है। जब तक देश का युवा जागेगा नहीं, तब तक चीजें नहीं बदलेंगी। आपको पुलिस से शिकायत है, तो अपने बच्चे को पुलिस में भेजें। व्यवस्था को आप नाकाम मानते हैं, तो राजनीति में प्रवेश करें। आप युवा हैं और आपको नौकरशाही सही नहीं लगती, तो आप आईएएस बनें। जब राष्ट्र का निर्माण होता है, तो ऐसा नहीं कि एक हवा का झोंका आया और निकल गया। वह ऐसा सैलाब होना चाहिए, जो हर चीज का रुख बदल दे। प्रदर्शन वगैरह जो आज दिखते हैं, वे सिर्फ शुरुआत हैं। एक एहसास हैं। एक पहल है।

हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि कहीं से कोई राजनेता पैदा हो जाएगा, पार्टी आ जाएगी और जादू की छड़ी घुमा देगी, जिससे सब सही हो जाएगा। बदलाव में हमें दस, बीस, तीस साल तक लगाने पड़ेंगे। आज आजादी हमें उस सोच से चाहिए, जो हमारी तरक्की में बाधक हैं।


मेरा जो आक्रोश है, वह यही है कि अमीर ज्यादा अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है। हमने देश का एक नया ही बंटवारा कर दिया है। अगर आप सबको एक से मौके न दें, देश के बच्चों को एक-सी शिक्षा न दें, तो उनका एक जैसा स्तर हो ही नहीं सकता। शुरुआत आपने यहीं से कर दी। फिर अमीर-गरीब का बंटवारा है। अमीर के पास जो ताकत है, वह गरीब को नहीं मिल सकती। जब तक यह बंटवारा खत्म नहीं होता, हम एक समाज नहीं बना सकते। सब कुछ बदल सकता है, नया सवेरा हो सकता है। नई पीढ़ी हमारे सामने है। हम उस पर विश्वास कर सकते हैं। जय हिंद!

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