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धीमी, खर्चीली न्याय व्यवस्था से जनता हताश: राष्ट्रपति
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Sat, 10 Nov 2012 11:55 PM IST
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि धीमी और खर्चीली न्याय व्यवस्था से जनता में भारी हताशा है। जल्द न्याय के लिए वैकल्पिक विवाद निपटारे (एडीआर) के तौर पर मध्यस्थता को बढ़ावा देना समय की मांग है।
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देश में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था होने के बावजूद यह हकीकत है कि कानूनी विवादों का निपटारा बहुत देरी से होता है। यह समूची न्याय व्यवस्था का एक दुखद पहलू है। जबकि मध्यस्थता तथा विवादों को निपटाने के विकल्पों से लोगों को कम खर्च पर न्याय हासिल हो सकता है।
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राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता एवं परामर्श परियोजना समिति (एमसीपीसी) की ओर से विज्ञान भवन में जिला अदालतों में मध्यस्थता विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैकल्पिक विवाद निपटारा प्रणाली न केवल त्वरित न्याय प्रदान कराने में उपयोगी साबित होती है, बल्कि अदालतों में मुकदमों का बोझ कम करने में भी सहायक होती है।
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उन्होंने कहा कि भारत के लिए मध्यस्थता प्रणाली कोई नई नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जमाने से पहले से ही पंचायत के माध्यम से विवादों के निपटारे की व्यवस्था थी जो आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में जारी है। राष्ट्रपति ने कहा कि बढ़ती आबादी के कारण मुकदमों की संख्या में इजाफा, इसके अनुपात में न्यायाधीशों की कमी, अदालतों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव और खर्चीली कानूनी सलाह के कारण न्याय पाना बहुत ही महंगा हो गया है। ऐसी स्थिति में मध्यस्थता न्याय पाने का किफायती जरिया हो सकता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि अनेक सामाजिक विवाद अब अदालतों की दहलीज तक पहुंच चुके हैं। ऐसी स्थिति में विवादों के निपटारे के वैकल्पिक तरीकों को बढ़ावा देना और लोकप्रिय बनाना समय की मांग है। उन्होंने विवाद निपटारे के इस तरीके के बारे में आम लोगों खासकर युवाओं और छात्रों में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि मध्यस्थता के माध्यम से वैवाहिक और पारिवारिक विवादों का सौहार्दपूर्ण निपटारा तो किया ही जा सकता है।
साथ ही उन्होंने कानूनी शिक्षा संबंधी पाठ्यक्रमों में भी वैकल्पिक विवाद निपटारे को अनिवार्य रूप से शामिल किये जाने की आवश्यकता जताई। व्यक्तिगत अनुभवों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि गलतफहमी और संवादहीनता के कारण भी बातें बिगड़ती हैं, लेकिन अगर संवादहीनता खत्म की जाए और गलतफहमी दूर की जाए, तो बात बन सकती है।
इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि न्यायिक व्यवस्था में शामिल अधिकारियों और न्यायाधीशों को मामले के निपटारे में टालमटोल वाला रवैया नहीं अपनाना चाहिए। न्याय पाने की आस में अदालत पहुंचे लोगों को छोटी-छोटी बातों पर वापस नहीं किया जाना चाहिए।