अफसोस कि भाजपा के आलोचक तो हैं, पर मोदी के नहीं
आडवाणी का इशारा वन मैन रूल की ओर था, जो एक तरह से सही ही है। सत्ता की सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटकर नहीं रह जानी चाहिए। इसी से आपातकाल जैसी परिस्थितियां बनती हैं। हालांकि मौजूदा दौर में संवैधानिक तौर पर तो उसकी गुंजाइश नामुमकिन है।
आपातकाल देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक काले धब्बे की तरह है। जिसका भूत कांग्रेस और उसके नेताओं का आने वाले सालों में भी कभी पीछा नहीं छोड़ेगा। आज नहीं तो कल कांग्रेस के नेताओं को इसका जवाब तो देना ही होगा। वे इससे बचकर नहीं जा सकते। समय उनसे कुरेदने वाले सवाल पूछेगा।
जब-जब इस काले दिन को याद किया जाएगा, लोकतंत्र इसका हिसाब तो मांगेगा ही। यह पूछा जाएगा आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी, जो लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख देने वाले आपातकाल को लगाना पड़ा।
आपातकाल के बाद गठित हुए शाह आयोग ने भी माना है कि न तो खुफिया एजेंसियों ने चेताया था और न ही कहीं और से कोई ऐसी खुफिया रिपोर्ट थी कि देश को अस्थिर करने के लिए कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में इंदिरा गांधी ने मनमाने तरीके से आपातकाल लगा दिया। उनके बेटे संजय गांधी के हाथों में इस तरह के फैसलों की बागडोर थी।
जितने भी दमनकारी उपाय हो सकते थे, इंदिरा और उनके बेटे संजय ने किए। मगर, वे शायद यह भूल गई थीं कि लोकतंत्र की कमान जनता के हाथों में होती है और उसका फैसला अंतिम होता है। आज लालकृष्ण आडवाणी ने जिस तरह से आपातकाल के बारे में अपने एक इंटरव्यू में कहा, वह दरअसल ‘वन मैन रूल’ की ओर इशारा करता है।
वह भले ही अपने बयान से मुकर गए हों या फिर मुकरना उनकी कोई मजबूरी रही हो, मगर यह तो सही है कि सत्ता की शक्तियां किसी एक के हाथ में सिमटने से ही आपातकाल जैसी परिस्थितियां बनती हैं।
कमजोर नजर आते हैं लोकतंत्र के सभी चौखंभे
हालांकि आज संवैधानिक तौर पर ऐसा कतई संभव नहीं है। क्यां कि ऐसे फैसले पर मुहर के लिए दो तिहाई बहुमत और आधे से अधिक राज्यों का समर्थन जैसे संविधान में कई विशेष और मुश्किल प्रावधान किए गए हैं। इंदिरा के जमाने में तो प्रधानमंत्री के पास काफी सारी शक्तियां थीं। उनका और उनके बेटे का रवैया भी तानाशाह जैसा ही था।
यहां तक कि न्यायपालिका को भी वह कुछ नहीं समझती थीं। आज ऐसा कुछ भी नहीं है। मुश्किल यह है कि आज जबकि लोकतंत्र के सभी चौपायों को मजबूत होना चाहिए, मगर वे अक्सर कमजोर नजर आते हैं। सब सत्ता के आगे बिछे हुए से नजर आते हैं। मीडिया बिरादरी की बात करें तो वह भी सेफ जोन में ही रहना चाहती है। बेवजह का पंगा क्यों लिया जाए। क्या गलत या क्या सही है, इसकी किसी को कोई परवाह नहीं।
अफसोस है कि आज मीडिया के लोग भाजपा की आलोचना तो करते हैं, मगर नरेंद्र मोदी की नहीं। यह चीज लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। लोकतंत्र के लिए खतरनाक है यह। मोदी की भी उतनी ही आलोचना होनी चाहिए और ऐसे आलोचकों को पर्याप्त तवज्जो मिलनी चाहिए। रही बात दमदार विपक्ष की तो इस समय कांग्रेस अपनी वंशवादी राजनीति में ही उलझी हुई है। जब भी कभी पार्टी के नेतृत्व की बात होती है, या तो राहुल या फिर उनकी बहन प्रियंका का ही नाम आगे आता है। अब ऐसे में सार्थक विपक्ष की भूमिका का तो कोई सवाल ही नहीं उठता। मुद्दे की बात कहां कोई करता है।
किसी को जाति और धर्म आधारित राजनीति की फिक्र है तो किसी को मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने की फिक्र। फिर सामाजिक समरसता भी खत्म हुई है। आज देश में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी है, मगर वे अलग-थलग होते जा रहे हैं। कुछ तो अपनी वजह से और कुछ औरों की वजह से। आज बैलेट बॉक्स भले ही जम चुके हैं।
मगर धर्मनिरपेक्षता जैसी चीज नहीं नजर आती। हिंदू-मुस्लिम सामाजिक संपर्क बहुत ही कम हो गया है। जबकि हमारे जमाने में हिंदू-मुस्लिम के बीच मजबूत सामाजिक तानाबाना था। संप्रदाय और धर्म से ऊपर उठकर गांवों और शहरों में लोग एक दूसरे से मिलते जुलते थे। उस समय मुस्लिम आबादी भी उतनी ज्यादा नहीं थी। आज हमारे घरों में कितने बेटे या बेटियां हैं, जिनके मुस्लिम दोस्त हैं। शायद न के बराबर या फिर बिल्कुल नहीं।
जनता और इतिहास ने कभी माफ नहीं किया
इसके अलावा राजनीति से नैतिकता भी खत्म हो गई, जो उस जमाने में एक बड़ी बात थी। राजनीति और लोकतंत्र को बेहद पवित्र माना जाता था। इसे दूषित करने वालों को बडे़ ही हेय नजरिए से देखा जाता था। आपातकाल के बाद इंदिरा के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश इसी का नतीजा था। जनता और इतिहास ने उनको कभी माफ नहीं किया।
लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाओं को मजबूत किया जाना चाहिए। आज का पत्रकार भी सत्ता की हवा में बह गया है। नौकरी, तरक्की ही उसके लिए पत्रकारिता का मूल मंत्र बन गया है। मिशन कहीं पीछे छूट चुका है, उसूल कब के दरकिनार हो चुके हैं और प्रोफेशन अब इंडस्ट्री में तब्दील हो चुका है।
आज मोदी की छवि सख्त नेता के तौर पर है, मगर इतना तो हुआ है कि उनकी प्रधानमंत्री पद की बागडोर संभालने से पहले लोगों में जो डर था कि मोदी हिंदूवादी राजनीति करेंगे या फिर मुस्लिम हाशिए पर पहुंच जाएंगे, वह डर खत्म होता नजर आ रहा है। क्यों कि मोदी काफी कुछ कर रहे हैं, बगैर किसी संप्रदाय विशेष को तवज्जो दिए। वह अब विकास की बात करते नजर आते हैं, जो राजनीति और लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है। (दिनेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)