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लखनऊ में अटल को ऐसी टक्कर फिर न मिली!

Thu, 27 Mar 2014 08:58 PM IST
Updated Thu, 27 Mar 2014 08:58 PM IST
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there was on ground against Vajpayee in Lucknow!

बात तब की है जब अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार लखनऊ से चुनाव मैदान में उतर रहे थे। वाजपेयी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सीट से पहली बार 1991 में चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे थे।

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आमतौर पर वाजपेयी को इस चुनाव में भी अजेय माना जा रहा था, लेकिन अचानक मुलायम सिंह यादव ने फिल्मी सितारे राजबब्बर को समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनाकर सबको चौंका दिया।
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यह चुनाव लखनऊ के लाडले अटल बिहारी वाजपेयी और दामाद राज बब्बर के बीच दिलचस्प मुकाबले में बदल गया। गौरतलब है कि राज बब्बर की पत्नी नादिरा लखनऊ की ही हैं और प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सज्जाद जहीर के परिवार की हैं।

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वाजपेयी ने गांधीनगर से भी भरा नामांकन

there was on ground against Vajpayee in Lucknow!

हालांकि लखनऊ से अटल बिहाली वाजपेयी की जीत को लेकर कोई शंका नहीं कर रहा था, लेकिन राज बब्बर की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही अगले दिन अचानक सुबह की एअर इंडिया की उडाऩ पकड़कर वाजपेयी गांधीनगर पहुंच गए और वहां से भी उन्होंने नामांकन दाखिल कर दिया।

क्योंकि वहां से सांसद रहे लाल कृष्ण आडवाणी तब तक हवाला मामले में बरी नहीं हुए थे और उन्होंने यह संकल्प किया था कि जब तक न्यायालय से बेदाग नहीं छूट जाते वह संसद में नहीं जाएंगे।

वाजपेयी के इस कदम को दो तरह से देखा गया। एक बात यह कही गई कि वाजपेयी आडवाणी के लिए गांधीनगर सुरक्षित रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वहां से भी नामांकन भरा कि दोनों जगह से चुनाव जीतने के बाद गांधीनगर सीट आडवाणी के लिए खाली कर देंगे, क्योंकि तब तक हवाला मामले का फैसला आ चुका होगा, जिसमें आडवाणी को क्लीन चिट मिलने की पूरी संभावना थी।

राजबब्‍बर ने मांगा था अटल से आशीर्वाद

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लेकिन दूसरी व्याख्या यह थी कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार वाजपेयी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे और राजबब्बर के आने से मुकाबला कांटे का हो गया था, इसलिए अपेक्षाकृत सुरक्षित सीट गांधीनगर से भी उन्होंने नामांकन भर दिया।

बहरहाल लखनऊ का चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया था। कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवार किसी गिनती में नहीं थे, और मुकाबला वाजपेयी और राजबब्बर के बीच सिमट गया। नामांकन भरने के बाद राजबब्बर सबसे पहले आशीर्वाद लेने वाजपेयी के ही पास पहुंचे। उन्होंने पैर छूकर वाजपेयी से विजयी भव का आशीर्वाद मांगा।

हंसते हुए वाजपेयी ने कल्याण भव का आशीर्वाद दिया और कहा कि महाभारत में भीष्म और द्रोण ने पांडवों को विजयी भव का आशीर्वाद दिया था, लेकिन मैं चाहता हूं कि राज बब्बर का कल्याण हो।

पूरे लखनवी अंदाज में लडा गया था चुनाव

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चुनाव प्रचार के दौरान राज बब्बर वाजपेयी के चुनाव प्रभारी और उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन के घर भी गए और उनसे कहा कि वह लखनऊ के दामाद हैं, इसलिए आशीर्वाद लेने आए हैं।

टंडन ने भी राज बब्बर का स्वागत किया और कहा कि प्यार दामाद के साथ है, लेकिन श्रद्धा, वफादारी और समर्थन गुरु वाजपेयी के साथ है।

इस तरह पूरी लखनवी अंदाज में होने वाला यह चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंचने लगा। अपनी जीत के प्रति आश्वस्त वाजपेयी पूरे देश में भाजपा के प्रचार के लिए घूम रहे थे और राजबब्बर लखनऊ की गलियों में अपने लिए वोट मांग रहे थे। राज का नारा था कि लखनऊ की तरक्की और नौजवानों के सपनों के लिए उन्हें चुना जाए, जबकि भाजपा नारा लगा रही थी कि ऐसा एमपी चुनो जो पीएम बनकर लौटे।

लगभग सवा लाख वोटों से जीते थे वाजपेयी

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राजबब्बर के तूफानी चुनाव प्रचार से लखनऊ का माहौल ऐसा गरमाया कि भाजपा के चुनाव प्रबंधकों को भी फिक्र हो गई कि कहीं गफलत में चुनाव हाथ से न निकल जाए।

वाजपेयी को खबर की गई और चुनाव प्रचार के आखिरी चार दिनों तक अपने बाहर के सारे कार्यक्रम रद्द करके वाजपेयी लखनऊ में जम गए। उन्होंने कई नुक्कड़ सभाएं की। सघन जनसंपर्क किया और लोगों से कहा कि अगर वह उन्हें पीएम बनाना चाहते हैं तो पहले एमपी बनाएं।

इस बीच सपा और मुलायम सिंह यादव से नजदीकी रिश्तों वाले एक स्थानीय उद्योग घराने ने राजबब्बर को जिताने के लिए अपनी कंपनी के सारे कर्मचारी उतार दिए।

भाजपा ने आरोप लगाया कि उक्त कंपनी के कर्मचारियों के जरिए फर्जी मतदान की साजिश की जा सकती है। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान लेकर खासी सख्ती कर दी। चुनाव हुआ। मुकाबला कड़ा था लेकिन करीब सवा लाख वोटों के अंतर से वाजपेयी की जीत हुई।

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