तब केंद्र में बजता था संजय गांधी का डंका!
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आपातकाल के बाद हुए 1977 के आम चुनाव में रायबरेली के बाद दूसरा सबसे ज्यादा चर्चित चुनाव क्षेत्र अमेठी था। यहां से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी अपना पहला चुनाव लड़ रहे थे।
उनके मुकाबले जनता पार्टी ने एक स्थानीय नेता रवींद्र प्रताप सिंह को मैदान में उतारा था। पूरे देश की निगाहें अमेठी पर थीं कि यहां की जनता क्या फैसला देती है।
हालाकि संजय सांसद नहीं थे लेकिन आपातकाल से कुछ पहले ही वह सक्रिय राजनीति में आए थे और कांग्रेस ही नहीं सरकार और देश में उनकी तूती बोलने लगी थी।
कांग्रेस में बन गई थी एक अलग समानांतर सत्ता
कहा तो यहां तक जाता था कि कई बार वह अपनी मां इंदिरा गांधी के फैसले भी बदलवा देते थे। संजय को कांग्रेस की युवा शाखा युवक कांग्रेस की बागडोर सौंपी गई थी और इसके जरिए संजय ने देश भर में युवक कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज तैयार की थी।
इरादा जयप्रकाश आंदोलन के मुकाबले का था। लेकिन संजय गांधी की युवा कांग्रेस आपातकाल के दौरान कांग्रेस में एक अलग समानांतर सत्ता केंद्र बन गई।
इंदिरा गांधी सरकार के मंत्रियों और पार्टी के पदाधिकारियों को प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष से ज्यादा तवज्जो संजय और उनकी मंडली को देनी पड़ती थी।
यह थी इंदिरा सरकार के पतन की प्रमुख वजह
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम के साथ संजय के पांच सूत्री कार्यक्रम सरकार की प्राथमिकताओं में थे। इन कार्यक्रमों में प्रमुख था परिवार नियोजन का, जिसे अमली जामा पहनाने के लिए देश भर में पुरुषों की नसबंदी का अभियान चलाया गया।
इस अभियान में हुई ज्यादतियां इंदिरा गांधी सरकार के पतन का प्रमुख कारण बनीं। आपातकाल में सरकार की तानाशाही और मनमानी के लिए इंदिरा से भी ज्यादा संजय गांधी को जिम्मेदार माना जाता रहा।
दिल्ली के तुर्कमान गेट कांड की वजह से मुसलमान भी कांग्रेस से खफा थे। लेकिन कांग्रेस संगठन के साथ साथ सरकारी तंत्र पर संजय की जबर्दस्त पकड़ थी। इसलिए जब वह पूरे ताम झाम और सरकारी लाव लश्कर के साथ अमेठी से चुनाव लडऩे पहुंचे तो किसी की भी हिम्मत उनके खिलाफ मैदान में उतरने की नहीं थी।
अमेठी राज परिवार ने झोंकी पूरी ताकत
उन दिनों चुनाव आयोग इस कदर सख्त नहीं था और सत्ता धारी दल के उम्मीदवार धड़ल्ले से सरकारी साधनों और तंत्र का दुरुपयोग करते थे।
इसके साथ ही अमेठी रियासत के राजकुमार संजय सिंह संजय गांधी के न सिर्फ दोस्त थे, बल्कि उन्होंने पूरे चुनाव का जिम्मा भी ले रखा था। संजय सिंह का इलाके में सामंती दबदबा था और लोग उनके सामने खड़े होने तक की हिम्मत नहीं करते थे।
अमेठी राज परिवार ने अपनी पूरी ताकत संजय गांधी को जिताने के लिए झोंक रखी थी। ऐसे में जनता पार्टी के उम्मीदवार रवींद्र प्रताप सिंह जो अपने कुछ साथियों के साथ मोटर साईकिल से चुनाव प्रचार कर रहे थे, उनकी जीत की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
75 हजार मतों से हारे थे संजय गांधी
रायबरेली में फिर भी राजनारायण इंदिरा गांधी का मुकाबला कर रहे थे जो समाजवादी आंदोलन के दिग्गज नेता थे और पिछले चुनाव में भी मैदान में उतर चुके थे। लेकिन अमेठी में संजय के प्रतिद्वंदी से देश और दुनिया अनजान थी।
पूरे जोर शोर से चुनाव प्रचार हुआ और इसमें संजय गांधी मीलों आगे थे। मतदान हुआ और जब मतगणना शुरु हुई तो संजय गांधी के समर्थकों में जोश और अहंकार दोनों था। लेकिन रवींद्र प्रताप सिंह भी मतगणना केंद्र पर अपने समर्थकों के साथ डटे थे।
कई चक्र की गिनती में बढ़त ऊपर नीचे होती रही, लेकिन बाद में रवींद्र प्रताप की बढ़त बढऩे लगी और जब अंतिम दौर की मतगणना के बाद नतीजे घोषित हुए तो करीब 75 हजार मतों से संजय गांधी चुनाव हार गए थे। लोगों को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था।
देश में मनाया गया वीआईपी हार का जश्न
आधी रात के बाद पूरे देश में आकाशवाणी से जब रायबरेली से इंदिरा गांधी और अमेठी से संजय गांधी के हारने की खबर आई तो पहले लोग स्तब्ध रह गए। फिर सड़कों पर उतर आए और पटाखे छूटने लगे, नारे लगने लगे।
रायबरेली और अमेठी ही नहीं देश के हर शहर में इस वीआईपी हार का जश्न मनाया गया। लेकिन सिर्फ ढाई साल में ही जनता क उम्मीदों पर पानी फिर गया और 1980 में रायबरेली से इंदिरा गांधी और अमेठी से संजय गांधी भारी मतों से चुनाव जीत कर आए।