फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   The Supreme Court decision ruled in dowry case

SC ने कहा खुशकिस्मत हो जो सात साल की ही सजा हुई

Sun, 01 Feb 2015 07:30 AM IST
Updated Sun, 01 Feb 2015 07:30 AM IST
विज्ञापन
The Supreme Court decision ruled in dowry case

सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या के एक मामले में दोषी सास से कहा कि उसे खुद को खुशकिस्मत समझना चाहिए कि उसे महज सात साल की सजा सुनाई गई है। अदालत ने कहा कि जिस तरह का यह अपराध है, उसके हिसाब से सजा बहुत कम है। शादी के करीब एक साल बाद ससुराल में महिला की मौत दर्शाता है कि ससुराल वालों ने उसका जीना किस कदर दूभर कर रखा था।

विज्ञापन


न्यायमूर्ति एफएम आई. कलीफुल्लाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने ताराबाई को बहू की मौत का दोषी ठहराते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि दहेज के लिए बहू को परेशान करना, मारना-पीटना बेहद गंभीर बात है।
विज्ञापन


इस तरह के अपराध के लिए सात साल की सजा कम है। इसके लिए और अधिक सजा सुनाई जा सकती थी। पीठ ने कहा है कि सास की प्रताड़ना से परेशान होकर शादी के करीब आठ महीने बाद महिला का मौत को गले लगाना खुद हालात बयां करता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ऐसे में सास के साथ किसी तरह की रियायत या संवेदना दिखाने का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में इस मामले में सास ही है जो पूरी तरह से बहू की मौत के लिए जिम्मेदार है।

यह है मामला

The Supreme Court decision ruled in dowry case

मामले के अनुसार कृष्णाबाई की शादी मई, 1989 को हनुमंत के साथ हुई थी। शादी के बाद से ससुराल में उसे जेवर, सामान आदि के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। सास और ननद कृष्णाबाई को अक्सर ताने मारती थीं। इतना ही नहीं कृष्णाबाई को सास द्वारा मारा-पीटा भी जाता था।

ससुर बीच-बचाव करने की कोशिश करते थे लेकिन सास उन्हें इस मसले में पड़ने से मना करती थी। 26 फरवरी, 1990 को कृष्णाबाई 100 फीसदी जली हुई अवस्था में अपने कमरे में मृत मिली। निचली अदालत ने सास ताराबाई और ननद बालाबाई को दहेज हत्या का दोषी ठहराते हुए सात-सात साल कैद की सजा सुनाई।

हालांकि बाद में मुंबई उच्च न्यायालय ने बालाबाई को तो बरी कर दिया लेकिन सास ताराबाई की सजा बहाल रखी। ताराबाई ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed