SC ने कहा खुशकिस्मत हो जो सात साल की ही सजा हुई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या के एक मामले में दोषी सास से कहा कि उसे खुद को खुशकिस्मत समझना चाहिए कि उसे महज सात साल की सजा सुनाई गई है। अदालत ने कहा कि जिस तरह का यह अपराध है, उसके हिसाब से सजा बहुत कम है। शादी के करीब एक साल बाद ससुराल में महिला की मौत दर्शाता है कि ससुराल वालों ने उसका जीना किस कदर दूभर कर रखा था।
न्यायमूर्ति एफएम आई. कलीफुल्लाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने ताराबाई को बहू की मौत का दोषी ठहराते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि दहेज के लिए बहू को परेशान करना, मारना-पीटना बेहद गंभीर बात है।
इस तरह के अपराध के लिए सात साल की सजा कम है। इसके लिए और अधिक सजा सुनाई जा सकती थी। पीठ ने कहा है कि सास की प्रताड़ना से परेशान होकर शादी के करीब आठ महीने बाद महिला का मौत को गले लगाना खुद हालात बयां करता है।
ऐसे में सास के साथ किसी तरह की रियायत या संवेदना दिखाने का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में इस मामले में सास ही है जो पूरी तरह से बहू की मौत के लिए जिम्मेदार है।
यह है मामला
मामले के अनुसार कृष्णाबाई की शादी मई, 1989 को हनुमंत के साथ हुई थी। शादी के बाद से ससुराल में उसे जेवर, सामान आदि के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा। सास और ननद कृष्णाबाई को अक्सर ताने मारती थीं। इतना ही नहीं कृष्णाबाई को सास द्वारा मारा-पीटा भी जाता था।
ससुर बीच-बचाव करने की कोशिश करते थे लेकिन सास उन्हें इस मसले में पड़ने से मना करती थी। 26 फरवरी, 1990 को कृष्णाबाई 100 फीसदी जली हुई अवस्था में अपने कमरे में मृत मिली। निचली अदालत ने सास ताराबाई और ननद बालाबाई को दहेज हत्या का दोषी ठहराते हुए सात-सात साल कैद की सजा सुनाई।
हालांकि बाद में मुंबई उच्च न्यायालय ने बालाबाई को तो बरी कर दिया लेकिन सास ताराबाई की सजा बहाल रखी। ताराबाई ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी।