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भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं 'जानलेवा' सियाचिन

Tue, 09 Feb 2016 06:49 PM IST
Updated Tue, 09 Feb 2016 06:49 PM IST
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The story which tells how India captured Siachin glacier four day before than Pakistan

सियाचिन में हाल ही में हुए हिमस्खलन और उसमें दबकर 9 जवानों की मौत के बाद इस बात पर यह सवाल उठ रहे हैं आखिर इतनी खतरनाक जगह पर सेना की तैनाती की जरूरत ही क्या है? हालांकि, कई दशक से इन सीमा पर जवानों की तैनाती को लेकर सवाल उठते रहे हैं लेकिन बावजूद इसके पूरे साल वहां जवान तैनात रहते हैं। सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र है वैसे में भारत की दृष्टिकोण से यह काफी महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

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पाकिस्तानी खेमे में भी इस मुद्दे पर कई बार चर्चा हो चुकी है कि सियाचिन से पाकिस्तानी जवानों को भी वापस बुला लेना चाहिए। यह बात खुद पाकिस्तानी जनरल राहील शरीफ ने कही थी। लेकिन भारत में अभी ऐसी कोई चर्चा नहीं ही खासकर सामरिक स्तर पर तो बिल्कुल ही नहीं। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने पत्रकार वार्ता के दौरान यह साफ कर दिया कि सियाचिन से किसी कीमत पर सेना वापस नहीं बुलाई जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि आखिर सियाचिन भारत के दृष्टिकोण से इतना महत्वपूर्ण क्यों है? जबकि इस क्षेत्र की रखवाली के लिए भारत सरकार हर रोज करोड़ो रुपये खर्च करती है।
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सियाचिन पर कब्जे की पृष्ठभूमि भारत-पाकिस्तान के बीच 1972 में हुए 'शिमला समझौते' से शुरू हुई। शिमला समझौते के दौरान यह बात साफ नहीं हो पाया की सियाचिन पर किसका कब्जा रहेगा। शिमला समझौते के तहत भारत यह मानता रहा कि पाकिस्तान की सीमा सल्तोरो रिज तक ही सीमित है जिसका अंतिम पाइंट एनजे9842 है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान यह मान रहा था कि उसके पूर्वोत्तर सीमा की शुरुआत एनजे9842 से शुरू होकर काकोरम पास तक जाती है। इसकी वजह से दोनों देश सियाचिन पर अपना-अपना दावा करते हैं।

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ग्लेशियर पर उतरा हेलीकॉप्टर

The story which tells how India captured Siachin glacier four day before than Pakistan

1980 के दशक के शुरुआत में पाकिस्तान ने सियाचिन में कुछ पर्वतारोहण अभियानों की अनुमति दी जो पाकिस्तान की ओर से चढ़ाई करेंगे। शायद, यह अनुमति इसलिए ही दी गई थी कि इससे वे सियाचिन पर अपना दावा मजबूत किया जा सके। इसके कई साल बाद 1978 में भारतीय सेना ने भी भारत की ओर से सियाचिन में पर्वतारोहण अभियान की अनुमति दे दी। भारतीय सेना के कर्नल नरिंदर कुमार की अगुवाई में तेरम कांगरी की पहाड़ियों में चढ़ाई की शुरुआत हो गई। इस दौरान उनके सा मेडिकल ऑफिसर कैप्टन एवीएस गुप्ता भी गए थे।

इस अभियान के दौरान भारतीय वायु सेना ने भी अहम योगदान निभाया और उन्हें खाने के साथ हर जरूरी सामान मुहैया कराया। फारवर्ड बेस कैंप से दो हताहतों को लाने के लिए 6 अक्टूबर 1978 में पहली बार वहां कोई हेलीकॉप्टर उतरा। इन हतहतों को चेतक हेलीकॉप्टर के द्वारा वहां से निकाला गया जिसे स्क्वाड्रन लीडर मोंगा और फ्लाइंग ऑफिसर मनमोहन बहादुर उड़ा रहे थे। इन्हीं पर्वातारोही अभियानों के बाद ही सियाचिन ग्लेशियर पर अधिकारों को लेकर विवाद की शुरुआत हो गई।

पाकिस्तान ने 1984 में एक महत्वपूर्ण चोटी (रिमो-I) को मापने के लिए एक जापानी अभियान को अनुमति दे दी जिसने भारत सरकार को यह शक करने का मौका दे दिया कि पाकिस्तान उस चोटी पर अपना अधिकार जमाना चाहता है। यह चोटी सियाचिन ग्लेशियर के पूर्व में स्थित है जो चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन सीमा को भी छूता है। इससे भारत सेना को यह विश्वास हो गया कि पाकिस्तान इस रास्ते अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए इस पर कब्जा कर सकती है।

ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत

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पाकिस्तानी जनरलों ने 1983 में सियाचिन पर अपना दावा मजबूत करने के लिए सेना की टुकड़ी भेजने का फैसला किया। भारतीय सेना के पर्वतारोहण अभियानों की वजह से उसे इस बात का डर सताने लगा कि भारत सियाचिन के दर्रों और पासों पर अपना कब्जा कर सकता है। इसकी वजह से उन्होंने सबसे पहले अपनी सेना भेजने का फैसला कर लिया। इसके लिए पाकिस्तान लंदन के एक सप्लायर को ठंड से बचने वाले कपड़ों का ऑर्डर दे दिया। लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि वहीं सप्लायर भारत को भी ठंड से बचने वाले कपड़ों की आपूर्ति करता है।

भारत को जब इस बात की जानकारी हुई तो उसने पाकिस्तान से पहले सियाचिन में सेना भेजने की प्लान तैयार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान के पर्वतारोहण कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए उत्तरी लद्दाख में सेना और ग्लेशियर के कई अन्य हिस्सों में पैरामिलिटरी फोर्स की तैनाती का फैसला किया। इसके लिए 1982 में अंटार्कटिक में हुए एक अभियान में हिस्सा ले चुके सैनिकों को चुनाव किया गया जो ऐसी विषम परिस्थितयों में रहने के लिए अभ्यस्त थे।

पाकिस्तान सेना को मात देने के लिए भारतीय सेना ने 13 अप्रैल 1984 को ग्लेशियर पर कब्जा करने का फैसला किया। जो पाकिस्तान के तय तारीख 17 अप्रैल से चार दिन पहले ही था। इसे ऑपरेशन का कोडनेम 'ऑपरेशन मेघदूत' रखा गया। इस ऑपरेशन की अगुवाई की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून के कंधों पर दी गई। वे उस वक्त जम्मू कश्मीर में श्रीनगर 15 कॉर्प के जनरल कमांडिंग ऑफिसर थे।

वायुसेना की अहम भूमिका

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वायु सेना के जहाजों द्वारा सेना के जवानों को ऊंचाई पर पहुंचाने के साथ ही ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत हो गई। इसके लिए वायु सेना ने आईएल-76, एनएन-12 और एन-32 विमानों को सामान ढ़ोने के लिए लगाया जो उच्चतम बिंदु पर स्थित एयरबेस पर सेना और सामानों को पहुंचाने लगे। इसके बाद वहां से एमआई-17, एमआई-8 और चेतक हेलिकॉप्टरों के जरिए सेना को आगे पहुंचाया गया।

इस ऑपरेशन का पहला चरण मार्च 1984 में शुरू तब शुरू हुआ जब ग्लेशियर के पूर्वी बेस पर सेना ने अपना पहला कदम रखा। कुमाउं रेजीमेंट और लद्दाख स्काउट की पूरी बटालियन हथियारों से लैस होकर बर्फ से ढके जोजि-ला पास से आगे बढ़ने लगे। इस दल की अगुवाई कर रहे लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) डीके खन्ना ने पाकिस्तानी रडार से बचने के लिए आगे का रास्ता पैदल ही तय करने का फैसला किया था। इसके लिए सेना को कई टुकड़ियों में बांट दिया गया। ग्लेशियर पर कब्जा करने के लिए मेजर आरएस संधु की अगुवाई में पहली टुकड़ी को आगे भेजा गया।

इसके बाद दूसरी टुकड़ी की जिम्मेदारी कैप्टन संजय कुलकर्णी को दी गई जिन्हें 'बिलाफोंड ला' पर कब्जा करना था। बची हुई टुकड़ी के साथ कैप्टन पीवी यादव को 'साल्टोरो रिज' पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। 13 अप्रैल तक सेना के करीब 300 जवान उन जगहों पर पहुंच चुके थे जिस पर कब्जा करने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी। इसके चार दिन बाद जब पाकिस्तानी सेना वहां पहुंचे तो उन्होंने पाया कि सभी महत्वपूर्ण तीन चोटियों पर भारतीय सेना का कब्जा है।

कैंप तब्दील हो गया सैन्य पोस्ट में

The story which tells how India captured Siachin glacier four day before than Pakistan

भारतीय सेना ने 1987 तक सियाचिन ग्लेशियर के सभी महत्वपूर्ण चोटियों पर अपना कब्जा कर लिया जिसमें 'सिया ला' प्रमुख है। इसके बाद पाकिस्तानी सेना के पास सोल्टोरो रिज के पश्चिमी ढलानों की रखवाली करने के अलावा कोई चारा दिखाई नहीं दिया।

इसके पीछे मुख्य कारण यह रहा कि पाकिस्तानी सेना इन चोटी पर कब्जा करने के लिए पूरी तरह से पैदल टुकड़ियों पर आधारित थी वहीं भारत ने इसके लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी और वायु सेना की मदद से उनसे चार दिन पहले ही इन चोटियों पर कब्जा कर लिया। ऐसा माना जाता है कि भारत की इस सफलता के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक ने भारत से बदला लेने के लिए एक योजना भी बनाई थी। हालांकि, घरेलु परेशानियों और गड़बड़ाते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की वजह से वह इसका बदला नहीं ले पाए।

भारत की सफलता को याद करते हुए पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि भारत ने इस तेज चाल की वजह पाकिस्तान के करीब 2,300 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस कब्जे के बाद ग्लेशियरों पर लगने वाला कैंप स्थायी सैन्य पोस्ट में तब्दील हो गया और दोनों देशों ने अपनी-अपनी सेनाएं वहां तैनात कर दी। इस दौरान कितनी जवान हताहत हुए इसकी कोई जानकारी नहीं है।

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