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मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिखाया आईना

Wed, 11 Mar 2015 09:16 AM IST
Updated Wed, 11 Mar 2015 09:16 AM IST
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The government has shown mirror to the Supreme Court

केंद्र सरकार का कहना है कि संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करता है न कि जजों द्वारा जज की नियुक्ति की। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का समर्थन करते हुए सरकार ने कहा कि जजों का काम मुकदमों का निपटारा करना है कि न नियुक्ति करना।

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उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पहले से चली आ रही कोलेजियम व्यवस्था को खत्म कर केंद्र ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून तैयार किया है। हालांकि अभी तक इस कानून को अधिसूचित नहीं किया गया है।
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केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने न्यायाधीश अनिल आर दवे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ के समक्ष कहा, अब समय आ गया है कि जब न्यायाधीशों की नियुक्ति का नया तरीका अपनाया जाए।
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सरकार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के पक्ष में

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उन्होंने कहा कि हम यह बात कहने की हिमाकत कर रहे हैं कि जजों का काम मुकदमों का निपटारा करना होता है कि न कि जजों की नियुक्ति का। रोहतगी ने कहा कि लोकसभा में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक बिना किसी विरोध के पारित हो गया है।

वहीं राज्यसभा से भी यह पास हो चुका है। इतना ही नहीं 20 राज्यों ने भी इसका समर्थन किया है। यह प्रमाण है कि सरकार जो कर रही है, वह सही कर रही है। अटार्नी जनरल ने कहा कि सरकार का इरादा न्यायपालिका से टकराव का नहीं है बल्कि वह चाहती है कि सर्वोत्तम व्यक्ति पारदर्शी तरीके से न्यायाधीश चुने जाएं।

उन्होंने कोलेजियम प्रणाली की खामियां गिनाते हुए कहा कि पारदर्शिता न होने के कारण अकसर इसकी आलोचना होती रही है। उन्होंने कहा कि  कोई भी सिस्टम परफेक्ट नहीं होता और न ही स्थायी होता है। समय-समय पर सिस्टम बदलना चाहिए।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग से वास्तव में न्यायपालिका और मजबूत होगी। अदालत आयोग को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। अटार्नी जनरल ने कहा कि सरकार उन तमाम अर्जी के सख्त खिलाफ है जिसमें आयोग को अधिसूचित करने पर रोक लगाने की मांग की जा रही है।

कहा संसद के पास असीम शक्ति

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उन्होंने कहा कि संसद के पास असीम शक्ति है। कानून को अधिसूचित करने के बाद अदालत के पास वीटो पॉवर नहीं होता और संविधान इसकी इजाजत नहीं देता।

इससे पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन, अनिल दीवान, भीम सिंह, एमएल शर्मा आदि ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग में भारत के प्रधान न्यायाधीश व सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, कानून मंत्री और दो नामचीन हस्ती होंगे।

इसके तहत अगर छह में से दो लोगों ने भी किसी नाम पर आपत्ति जताई तो उसकी नियुक्ति नहीं होगी। ऐसे में तीनों जजों के निर्णय को कभी भी खारिज किया जा सकता है।

ऐसे में न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। मालूम हो कि कोलेजियम प्रणाली के तहत मुख्य न्यायाधीश समेत और सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठ न्यायाधीश उच्च न्यायालय और सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों की नियुक्त करते थे।

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