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सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, आपराधिक मानहानि सही

Sun, 12 Jul 2015 08:00 AM IST
Updated Sun, 12 Jul 2015 08:00 AM IST
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The government affidavit in the Supreme Court

केंद्र सरकार ने आपराधिक मानहानि को सही करार दिया है। इस कानून पर सरकार का कहना है कि यह उन वक्तव्यों पर पाबंदी लगाता है जो आम बातचीत या सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं हो सकते। चूंकि कई देशों ने आपराधिक मानहानि को खत्म कर दिया है, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि भारत भी ऐसा ही करे।

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सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में गृह मंत्रालय ने कहा है कि आपराधिक कानून समाज के हिसाब से बनाए जाते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे देश ऐसा कर रहे हैं, हमें भी ऐसा करना चाहिए, यह तर्कसंगत नहीं है।
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सरकार ने कहा है कि आपराधिक मानहानि से संबंधित प्रावधान (भारतीय दंड संहिता की धारा-499 और 500) का मकसद ऐसी बातचीत पर लगाम लगाना था, जो आम बातचीत या सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं हो सकती।
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राहुल, केजरीवाल और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मानहानि के प्रावधानों को दी है चुनौती

The government affidavit in the Supreme Court

हलफनामे में कहा गया है कि आपराधिक मानहानि के प्रावधान उन वक्तव्यों के लिए हैं जिनसे किसी व्यक्ति या उसके परिवारवालों या करीबी लोगों की छवि को नुकसान पहुंचता हो। साथ ही इससे समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।

किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा है। हालांकि धारा-499 में अपवाद भी है। इसके तहत उन वक्तव्यों को इसके दायरे से दूर रखा गया है, जो सही हो, अच्छी नीयत से बोला गया हो या सार्वजनिक हित में हो।

सरकार का कहना है कि सिविल उपाय लंबा खिंच जाता है, इसलिए आपराधिक मानहानि जरूरी है। तकनीक के नए दौर में ऑनलाइन मानहानि से निपटने के लिए सिविल उपाय पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सजा का प्रावधान जरूरी है।

सरकार के मुताबिक, सिर्फ इस आधार पर कि किसी कानून का दुरुपयोग हो सकता है, उस कानून को निरस्त करने की पैरवी करना बेमानी है। साथ ही सरकार का मानना है कि चूंकि याचिकाकर्ताओं ने संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती दी है और यह कानून से जुड़ा मामला है। लिहाजा इसकी सुनवाई कम से कम पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष होनी चाहिए।

केंद्र सरकार का यह जवाब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी समेत कई अन्य द्वारा दाखिल उन याचिकाओं के जवाब में आया है, जिनमें आपराधिक मानहानि के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि मानहानि में सजा का प्रावधान उचित नहीं है। ऐसा करना व्यक्ति के बोलने और अभिव्यक्त करने पर बेवजह पाबंदी लगाता है।

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