'10 साल पहले, एक दिन अचानक' और सब कुछ तबाह
एक तस्वीर जिसने पूरी दुनिया में दस साल पहले आई सूनामी की तबाही को खामोशी से बयां किया। तमिलनाडु के कडालोर जिले की वो औरत जिसकी मातम मनाती तस्वीर उस दौरान भारत में सूनामी के कहर का चेहरा बन गई। जाने माने फोटोग्राफर आर्को दत्ता ने समुद्र तट पर बिलखती हुई उस औरत की तस्वीर कैमरे में कैद की थी।
उस साल इस तस्वीर को वर्ल्ड फोटो पुरस्कार दिया गया। आज वो अपने 17 साल बेटे के साथ कडालोर में रह रही हैं। घटना की वो चश्मदीद गवाह रही हैं। वो कहती हैं, "सूनामी ने सबकुछ निगल लिया।" इस घटना के दस साल गुजर गए, लेकिन क्या उनकी हालत में कोई बदलाव आया?
"आप यहां क्यों आते हैं? आप मुझसे बात करने आते हैं और मुझे मार पड़ती है। वो लड़की सोचती है कि आप सभी यहां आकर मुझसे बात करते हैं और मुझे पैसे देते हैं। मैं ही जानती हूं अपनी मुसीबत।"
अपनी घास-फूस की झोपड़ी से झांकती इस दुबली पतली महिला की पहली बातचीत यहीं से शुरू होती है। अपने पोते को गोद में उठाए 42 साल की वो औरत कहती हैं, "हां, मैं ही हूं इंदिरा। मैं जानती हूं आप मुझे ही खोज रहे हैं।"
एक तस्वीर ने कई कहानियों को दिया चेहरा
दस साल पहले कोई भी उनका नाम नहीं जानता था। संभव है, किसी की रुचि भी नहीं रही हो। लेकिन एक तस्वीर ने उनके दुख की कई कहानियों को चेहरा दे दिया और वे महज एक औरत नहीं रहीं।
इंदिरा कहती हैं, "इस बारे में बातें कर मैं थक गई हूं।" जब कोई उनसे अपने आने का कारण बताने की कोशिश करता है तो इंदिरा तुरंत ही अपनी उस पहचान की कहानी सुनाने के लिए तैयार हो जाती है, "मेरे पास सभी क़ागजात हैं। रुकिए, मैं दिखाती हूं।" और वो तस्वीर में खुद की पहचान कराती हैं। इसके साथ कुछ पड़ोसी भी इंदिरा की झुंझलाहट की वजह बताते हैं, "जब भी आप जैसे लोग उनसे मिलने आते हैं, उन्हें उस 'लड़की' से मार पड़ती है।"
इंदिरा जिस 'लड़की' का नाम लेती हैं, वो इस पुरस्कृत तस्वीर में दिखने वाली मृतक महिला मागेश्वरी की बेटी है। मागेश्वरी इंदिरा की भाभी थीं। उनके भाई की भी दो साल पहले मृत्यु हो गई। तब से इंदिरा की ज़िंदगी आसान नहीं रही है।
इंदिरा की जुबानी उन काली लहरों की कहानी
दस साल पहले जब सूनामी आई थी, इंदिरा बहुत दूर नहीं थीं। कडालोर के बाद नागापट्टनम जिला सबसे अधिक प्रभावित हुआ था। जब 'काली' लहरें तट से टकराईं उस समय को याद कर इंदिरा कहती हैं, "मुझे लगता है कि सुबह के आठ बजे का वक़्त रहा होगा। मैं अपने बच्चों को खोजने के लिए भागी, लेकिन केवल बड़ी बेटी ही मिल पाई। मैंने उससे पूछा कि और बच्चे कहां हैं। उसने बताया कि मेरा छोटा बेटा नहीं मिला।"
वो याद करते हुए कहती हैं, " मैंने जब बेटी से पूछा कि उसने भाई को कहां छोड़ा था। उसने कहा कि भगदड़ मच गई थी। कुछ लोग मरे पड़े थे। मैंने सोचा कि मेरा बेटा मर गया। लेकिन मेरा बेटा दूसरे गांव में मिला और मुझे देखते ही उसने गले लगा लिया।"
बेटे को कभी समंदर में नहीं जाने दूंगी
परिवार को मागेश्वरी का शव बाद में मिला। हालांकि इंदिरा को जो आर्थिक सहायता मिली वो मात्र 4,000 रुपए थी। इतनी ही राशि उन सभी लोगों को दी गई थी जिनके घर बर्बाद हो गए थे।
इंदिरा के पति सूनामी से बहुत पहले उन्हें छोड़कर चले गए थे और उन्होंने अपने बच्चों को इडली और डोसा बेचकर बड़ा किया। वो कहती हैं, "लोग पूछते हैं कि वही काम मैं अब क्यों नहीं करती, लेकिन मैं अब नहीं कर सकती। अब मुझे बेचैनी होती है। मेरी सेहत अच्छी नहीं है। मेरा 17 साल का बेटा जाल बुन कर हम दोनों के खाने भर का कमा लेता है।"
इंदिरा कहती है, "मैं अपने बेटे को समंदर में मछली पकड़ने नहीं जाने दूंगी। क्या होगा अगर वो डूब जाएगा। मेरे पास उसके सिवाय कुछ नहीं है। अगर वो दूर चला जाएगा, तो मेरा क्या होगा।"
तो क्या सूनामी के बाद बेहतर हुई ज़िंदगी ?
दो साल तक इंदिरा राहत शिविर में रहीं। वो गर्व से एस्बेस्टस की चद्दर दिखाती हैं, जो अब उनके घर का हिस्सा बना हुआ है। यह घर एक गैर सरकारी संस्था द्वारा बनाया गया है और इसमें दरवाजा नहीं है।
वो कहती हैं, "हां, मुझे सरकार की ओर से सस्ता राशन मिलता है। लेकिन मैं इसे बेचती नहीं हूं। आप मुझसे चुनाव के दौरान किए जाने वाले वादों के बारे में बात कर रहे हैं। लेकिन मुझे मुफ्त मिक्सी ग्राइंडर मशीन नहीं मिली, लेकिन उन्होंने एक टेलीविजन दिया था जिसे मेरे पोते ने तोड़ दिया है।"
इंदिरा कहती हैं, "मैं गर्व से रहती थी, आभूषण पहनती थी। मुझे वो दिन याद आते हैं क्योंकि मैं खुश थी। अब मेरी हालत देखिए। समंदर ने सबकुछ निगल लिया। अब यदि रोज़ाना 50 रुपए मिलें तो हम ज़िंदा रह सकते हैं।"
कम नहीं हुई मुश्किलें
मेरे एक और सवाल के पहले ही इंदिरा की पड़ोसी सेल्वी बीच में बोल पड़ती हैं, "सर, आप यहां क्यों आए हैं। कृपया, जितनी देर आप रुके रहेंगे, इंदिरा की भतीजी उन्हें उतना ही पीटेंगी। इसलिए आप चले जाईए।"
इंदिरा कहती हैं, "कोई भी मेरी मुश्किल को नहीं समझता। कृपया किसी से कहिए और मेरे लिए कुछ करिए।" मुझे वहां से चले जाने के लिए वो आग्रह करती है। पूरे देश में और इस हिस्से में भी किसी भी अतिथि से यह कहने का रिवाज है- 'पोइट्टा वांगो' यानी कृपया फिर लौटकर आईएगा। लेकिन मुझसे इंदिरा यह नहीं कहतीं। शायद इसलिए कि अपनी मुश्किलें सिर्फ वही जानती हैं।