मिशन 2020 का भाजपा ने किया आगाज
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रियासत-ए-जम्मू कश्मीर में जो परिणाम सामने आए हैं, उसे सत्ता विरोधी नहीं व्यक्ति विरोधी कहना चाहिए।
सबसे बड़े दल पीडीपी ने भले ही 28 सीटें हासिल कीं, लेकिन सत्ता में न होने के बावजूद उसके कई वर्तमान विधायकों को पराजय का सामना करना पड़ा। पिछले छह साल में सरकार ने भले ही अच्छे बुरे काम किए, लेकिन मतदाताओं ने इस बार प्रत्याशियों को आंकने के बाद ही वोट दिए।
वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर पिछले 35-36 सालों से लगातार चरार-ए-शरीफ से जीत रहे हैं। मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने काम भी किए। लेकिन उनका ज्यादा ध्यान अपने क्षेत्र बांडीपोरा में रहा। इसी वजह से मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के स्टार प्रचारकों की तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा कश्मीर घाटी में एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई। इसके बावजूद इसे भाजपा की हार नहीं मान सकते।
भाजपा का लक्ष्य 2014 विधानसभा चुनाव नहीं थे। उनका टारगेट 2020 चुनाव हैं। घाटी में भाजपा ने कई उम्मीदवार उतारे। कार्यकर्ता भी पैदा किए। कुछ वोट भी हासिल किए। अब अगले छह साल भाजपा घाटी में अपना आधार बनाने की कोशिश करेगी।
विधानसभा चुनाव में भाजपा दूसरे नंबर पर
इससे पहले इसी तरह पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 2002 में जब जम्मू का रुख किया था। कहा जाता था कि घाटी के दल को जम्मू में रेस्पांस नहीं मिलेगा। लेकिन 12 साल बाद आज पीडीपी को जम्मू में भी सीटें मिल रही हैं। इसी तरह भाजपा भी कश्मीर में आधार बना ले तो कोई ताज्जुब नहीं होगा।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा गांदरबल सीट छोड़ना एक गलत निर्णय रहा। वहां नेशनल कांफ्रेंस का लगातार वर्चस्व रहा है। भले ही उमर ने कुछ नए चेहरों को आगे लाने के लिए यह सीट छोड़ी। जिस प्रत्याशी को गांदरबल से उतारा, वह जीत भी गया। लेकिन उमर का अपना अस्तित्व खतरे में पड़ गया।
अब्दुल्ला परिवार की परंपरागत सीट सोनवार (जहां से वह मताधिकार का उपयोग भी करते हैं) से हारने के अलावा बीरवाह से भी बड़ी मुश्किल से जीत हासिल की। यह जीत भी इसलिए मिली, क्योंकि उनके ऊपर मुख्यमंत्री का टैग लगा हुआ था।
लद्दाख में भाजपा को सीट की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए थी। लोकसभा चुनाव में किन हालात में उन्होंने जीत दर्ज की, वह सर्वविदित है। यदि नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस अलग-अलग न लड़ते तो भाजपा जीत नहीं सकती थी।
इसके अलावा रही-सही कसर दोनों दलों के बागी उम्मीदवारों ने पूरी कर दी थी। इसी कारण भाजपा को जीत मिली थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी झोली खाली रही।
श्रीनगर में पिछले दिनों आई बाढ़ के दौरान सरकार की नाकामियों का परिणाम भी उमर सरकार को मिला है। श्रीनगर नेशनल कांफ्रेंस का गढ़ माना जाता रहा है। यहां की आठ सीटों में से उन्हें तीन ही मिली। वह भी जिन क्षेत्रों में बाढ़ का प्रभाव नहीं था।