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जस्टिस ज्ञान सुधा पर अटॉर्नी जनरल की टिप्पणी बेटी को गुजरी नागवार

Fri, 26 Jun 2015 10:31 PM IST
Updated Fri, 26 Jun 2015 10:31 PM IST
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The Attorney General comment on Justice Gyan Sudha

कोलेजियम सिस्टम पर प्रहार के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी द्वारा खराब नियुक्ति के तौर पर न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा का उदाहरण पेश करना न्यायमूर्ति मिश्रा उनकी बेटी उन्नति मिश्रा को नागवार गुजरा है। पेशे से वकील उन्नति ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर मां पर की गई टिप्पणी पर घोर आपत्ति जताई है।

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अपने पत्र में उन्नति ने कहा है कि यह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के नाम पर उस व्यक्ति की छवि खराब करना है, जिसने न्यायपालिका के लिए खून-पसीना लगा दिया। किसी को निजी विचार व्यक्त करने की छूट है लेकिन ओपन कोर्ट रूम में निजी विचार रखने के बड़े मायने होते हैं।
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पत्र में कहा गया है कि क्या समय पर अदालत न आने के आधार पर किसी को गलत जज बताया जा सकता है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने इस संस्थान को ईमानदारी और बिना किसी भेदभाव के अपनी सेवाएं दीं। यही कारण है कि बार-बार उनकी छवि को खराब करने का प्रयास करने के बावजूद उनकी पहचान और ख्याति अब भी बनी हुई है।
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उन्नति ने कहा कि न्यायमूर्ति मिश्रा के एलिवेशन की सिफारिश वर्ष 1986 में की गई थी, उस वक्त कोलेजियम सिस्टम अस्तित्व में भी नहीं आया था। उस वक्त उनकी उम्र महज 37 वर्ष थी। जब उन्हें एलिवेट किया गया था तब तत्कालीन भारत के प्रधान न्यायाधीश ने उन्हें बधाई थी और कहा कि आप इसकी हकदार हैं।

बेटी ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र, कहा - ऐसा करना छवि खराब करना

The Attorney General comment on Justice Gyan Sudha

बार आईसीयू में भी एडमिट किए जा चुके हैं, बावजूद इसके उन्होंने काम से समझौता नहीं किया। इस दौरान उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली और न ही समय से पहले अदालती काम छोड़ा।

न्यायमूर्ति मिश्रा झारखंड हाईकोर्ट की पहली मुख्य न्यायाधीश बनी। वह सुप्रीम कोर्ट की चौथी जज नियुक्त हुई। पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में समय को लेकर शुरू से लचीलापन देखा गया है।

सोमवार और शुक्रवार के दिन अदालत के शुरू होने का वक्त तो साढ़े दस बजे होता है लेकिन खत्म होने का कोई वक्त नहीं होता। कई जज तो लंच के पहले की काम कर उठ जाते हैं।

यह दर्शाता है कि सिस्टम में समय में लचीलापन स्वीकार योग्य है। जस्टिस मिश्रा बेशक निर्धारित समय से देरी से अदालती कार्यवाही शुरू करती थीं लेकिन वह अदालत परिसर छोड़ने वाली आखिरी व्यक्ति होती थीं, चाहे वह हाईकोर्ट में रही हों या सुप्रीम कोर्ट में।

जस्टिस मिश्रा रोबोट की तरह काम नहीं करती थी क्योंकि वह इससे इत्तेफाक नहीं रखती थीं कि घड़ी के हिसाब से अपने काम को अंजाम दिया जाए। उनका ध्येय होता था कि अच्छे फैसले दिए जाएं।

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