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आजमगढ़ से इसलिए चुनाव लड़ रहे हैं 'मुल्ला' मुलायम

Wed, 19 Mar 2014 02:16 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 19 Mar 2014 02:16 PM IST
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thats why mulayam fighting ls elections from azamgarh

लोकसभा चुनाव 2014 की सबसे बड़ी जंग पूर्वांचल में लड़ी जाएगी। अब यह तय हो चुका है। नरेंद्र मोदी के बनारस से लड़ने की बात तय होने के बाद यह लग रहा था कि यूपी का चुनाव इस बार खासा दिलचस्प हो सकता है।

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लेकिन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने नया दांव खेलते हुए इसमें देश की उत्सुकता कई गुना बढ़ा दी है। उनके पीछे-पीछे आम आदमी पार्टी वाले अरविंद केजरीवाल हैं, जो मोदी के खिलाफ चुनाव लड़कर अपना कद बढ़ा करने का ख्वाब देख रहे हैं।
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नया मास्टरस्ट्रोक मुलायम की तरफ से आया है। समाजवादी पार्टी ने ऐलान कर दिया है कि उसके नेताजी पश्चिमी यूपी के अलावा पूर्वी छोर से भी खड़े होंगे और यह तय है कि इसका मकदस मोदी की लहर की काट तलाशना है।
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इसलिए चुना गया आजमगढ़ को

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मुलायम सिंह यादव अपनी परंपरागत सीट मैनपुरी के अलावा आजमगढ़ से लड़ेंगे। बनारस में मोदी बनाम केजरीवाल और दूसरे नेताओं की लड़ाई से बमुश्किल सौ किलोमीटर दूर मुलायम का मैदान में उतरना हैरानी भी पैदा कर रहा है।

दरअसल, यह सोचा-समझा दांव है। और इसका मकसद है पार्टी को हाल में हुए भारी नुकसान की भरपाई करते हुए चुनावों में आखिरी संजीदा कोशिश। जिस तरह बनारस हिंदुत्व का केंद्र बिंदू माना जाता है, उसी तरह आजमगढ़ मुस्लिम सियासत का गढ़ है। दोनों सीट एक-दूजे से सटी हैं।

राजनीतिक विरोधी भी दबी जुबान से स्वीकार कर रहे हैं कि मोदी को बनारस से उतारने के भाजपा के फैसले ने उत्तर प्रदेश में सियासी खेल और उसके नियम बदल दिए हैं।

मुस्लिम वोटर बेस पर डोरे डाले

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भाजपा ने यह फैसला इसलिए किया क्योंकि उसे उम्मीद है कि मोदी अगर बनारस से लड़े, तो इसका असर पूर्वांचल की सभी 32 सीटों पर होगा, जिससे लोकसभा चुनावों में उसका स्कोर सुधर सकता है।

इसके अलावा मोदी लहर के ख्वाब देख रही भगवा पार्टी बिहार तक असर होने की उम्मीद बांध रही है। दूसरी ओर, मुलायम इसलिए आजमगढ़ को चुन रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपनी राजनीति संभालनी है।

सपा अपने वोटर बेस, खास तौर से मुस्लिम समाज के बीच यह संदेश देना चाहती है कि उसने हार नहीं मानी है और वह मोदी को चुनौती देने के लिए तैयार है। हाल तक ऐसा लग रहा था कि अरविंद केजरीवाल के अलावा दूसरा कोई बड़ा नेता मोदी के सामने खड़े होने को तैयार नहीं है। लेकिन मुलायम यूपी की जंग को सपा बनाम भाजपा बनाना चाहते हैं।

दंगों के दाग कुछ कम होंगे

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यादवों के अलावा मुस्लिम समुदाय लंबे वक्‍त से सपा का साथ देता रहा है और पार्टी के आज आजम खां जैसे नेता हैं, जो गहरी पैठ रखते हैं। लेकिन मुजफ्फरनगर में भड़के दंगों ने सपा की सेकुलर छवि को तगड़ी चोट पहुंचाई है।

समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार मान रहे हैं कि आजमगढ़ से चुनौती देने से मुस्लिम समुदाय में एक बार फिर पैठ बनाई जा सकेगी और पार्टी कार्यकर्ताओं के एकजुट होने का संदेश जाएगा, जो अब तक बिखरा दिखाई दे रहा है।

दरअसल, सपा भी जानती है कि पिछले दो चुनावों से यूपी की दस सीटों पर सिमटी दिखी भाजपा इस बार अच्छी तैयारी के साथ मैदान में है और उसका संख्याबल मजबूत हो सकता है।

भाजपा की चाल का क्या जवाब?

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लेकिन एक मुश्किल भी है। भाजपा ने अब तक सही रणनीति का इस्तेमाल किया है। मोदी ह‌िंदुत्व के एजेंडे को विकास का मुलम्मा ओढ़ाकर प्रचार कर रहे हैं, जिससे यह संदेश अब तक नहीं गया है कि वह साम्प्रदायिकता की राजनीति करने आए हैं।

इस वजह से सपा को कुछ दिक्कत हो रही है। अगर भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे को सामने रखती, तो उसके पक्ष में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होने की संभावनाएं बढ़ जातीं।

अब तक ऐसा नहीं हुआ है और इस वजह से यूपी में 'सेकुलर' वोट बंटने का डर बढ़ गया है। इस बात से सभी वाकिफ हैं कि मोदी की राजनीति का आधार हिंदुत्व है और बनारस भी इसलिए चुना गया, लेकिन अब तक यह जाहिर नहीं किया गया है।

क्या सपा की रणनीति कामयाब होगी?

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सपा के लिए मुश्किल वक्‍त है। हाल तक मायावती की टेंशन से जूझने वाली पार्टी इस बार दोतरफा मुश्किल में है। विधानसभा चुनावों में धमाकेदार जीत करने के बावजूद उसका प्रशासन तारीफ नहीं, आलोचना बटोरता रहा है।

और दूसरी तरफ उसका मुख्य वोटर बेस मुस्लिम इस बार उससे छिटकता दिख रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका नुकसान हो सकता है, लेकिन पार्टी पूर्व में इस असर को कम करना चाहती है।

पार्टी का मानना है कि अगर मोदी को सामने रख साम्प्रदायिकत ताकतों को रोकने का जुमला फेंका जाता है, तो मुजफ्फरनगर दंगों की स्थिति संभालने में उससे हुई चूक कुछ हद तक बैकफुट पर जा सकती है।

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