गोली चाहे बेटा मारे या पड़ोसी, मौत सिर्फ मां की होती है
मुझे उस वक्त अफसोस होता है जब कोई कहता है कि भारत-पाक आपसी दुश्मन हैं। दोनों ही मुल्क कुछेक सालों से आतंकवाद झेल रहे हैं, और मरने वाले केवल निर्दोष नागरिक हैं।
सुनते हैं कि दुश्मन का दुश्मन आपस में दोस्त होते हैं तो फिर भारत और पाकिस्तान महज एक दुश्मन (आतंकवाद) को मिटाने के लिए क्या गले नहीं मिल सकते? मैं तो मानता हूं कि मां को गोली चाहे बेटा मारे या पड़ौसी, सीना तो मां का ही छलनी होता है।
पाकिस्तानी सेना को भी अब समझ में आ रहा है कि आस्तीन में कई सांप हैं और आतंकी अच्छे या बुरे नहीं होते। मैं समझता हूं कि पाक सेना के रवैये में भी अब तब्दीली आई है।
लेकिन भारत हो या पाकिस्तान दोनों को यह हकीकत समझनी पड़ेगी कि हमला चाहे पठानकोट में हो या पेशावर में, शामत आम नागरिकों की ही आएगी।
इसलिए दोनों मुल्कों को हमलों की जांच के लिए आपस में आना-जाना जारी रखना चाहिए। भारत को भी अपनी टीम पाक भेजकर आतंकवाद की जांच करनी चाहिए। दूर बैठकर जुबानी हमले दुश्मनी ही फैलाएंगे, मोहब्बत के लिए सियासी बातचीत जरूरी है।
अब दोनों का शत्रु है आतंकवाद
अक्सर मैंने देखा है कि जब कभी लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच हालात सामान्य होते हैं, आतंकी किसी न किसी वारदात को अंजाम दे बैठते हैं। ऐसे में दोनों के बीच दो कदम आगे बढ़ी बातचीत कोसों मील पीछे चली जाती है।
इसलिए जरूरी है कि दोनों देश आम लोगों को भी मेल-मोहब्बत का मौका दें। इसके लिए आवाजाही को सामान्य करना सबसे ज्यादा जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दोनों मुल्कों की बर्बादी निश्चित है।
(भूपेश गुप्ता से फोन पर हुई बातचीत पर आधारित)