छात्राओं को परीक्षा में दिल खोलकर नंबर देते हैं टीचर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 60 देशों में कराए गए एक अध्ययन में पता चला है कि परीक्षाओं में छात्राओं को उनके ही बराबर काबिल छात्रों के मुक़ाबले अधिक नंबर मिलते हैं।
शिक्षा में लैंगिक भेदभाव को लेकर ऑर्गनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के अध्ययन में कहा गया है कि आत्मविश्वास में कमी और रुढ़िवादी सोच के चलते लड़कियां विज्ञान और गणित में करियर बनाने की ओर नहीं बढ़तीं।
दूसरी ओर लड़कों में आक्रामकता अधिक होने की संभावना होती है और वो अपने होमवर्क पर कम समय देते हैं। अध्ययन में कहा गया है, “छोटी उम्र से ही लड़के कक्षा में बोलने से कतराते हैं और जब तक कहा न जाए, वे नहीं बोलते हैं या किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेते हैं। वो ध्यान लगा कर कम सुनते हैं और किसी गतिविधि के शुरू होने के पहले उस पर ध्यान भी कम देते हैं।”
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, लड़कों में कक्षाएं छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है. परीक्षा का समय नजदीक आने पर लड़कियों को अधिक नंबर देने का ढर्रा सामाजिक ढंग से नजर आता है।
रूढ़िवादी सोच के शिकार होते हैं टीचर
अध्ययन में कहा गया है कि लड़कों और लड़कियों की पढ़ाई से संबंधित खूबियों और कमजोरियों को लेकर अध्यापक रूढ़िवादी सोच के शिकार होते हैं।
इसमें यह भी कहा गया है कि छात्र के कामों के वस्तुगत आकलन की बजाय, अध्यापक सांगठनिक कौशल, अच्छा व्यवहार और आज्ञाकारी होने को अधिक तवज्जो देते हैं।
अध्ययन के नतीजों में कहा गया है कि अध्यापकों को ‘लैंगिक भेदभाव’ के प्रति सजग रहने की जरूरत है। ओईसीडी के शिक्षा निदेशक एंड्रेयिस श्लेशेयर कहते हैं, “लंबे दौर में यही अधिक नंबर आपको परेशान करेंगे, क्योंकि श्रम बाजार में स्कूली योग्यता से आपको नौकरी नहीं मिलती है।”
इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विज्ञान और गणित में लड़कियां खुद की क्षमता को कम कर आंकती हैं।