सुषमा ने पढ़े सोनिया की शान में कसीदे, पर बात नहीं मानी
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था तो यह 15वीं लोकसभा के सत्र का अंतिम दिन। जाहिर है भारी कड़वाहटों के बीच भावुकताओं का दौर भी आया। यहां तक कि नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की शान में कसीदे पढ़ डाले। बावजूद इसके सोनिया की मान-मनौव्वल को सुषमा ने अपने अनोखे अंदाज में ठुकरा दिया।
तेलंगाना पर कांग्रेस और भाजपा की सियासी डील तो सिरे चढ़ गई। लेकिन देश की पहली महिला यूनिवर्सिटी के मामले पर ऐसा नहीं हो सका। रायबरेली में प्रस्तावित इंदिरा गांधी केंद्रीय महिला विश्वविद्यालय बिल पारित नहीं हो पाया।
इसके लिए खुद सोनिया गांधी ने सत्र के अंतिम दिन भाजपा नेता सुषमा स्वराज को मनाने के लिए उनसे बात की, लेकिन सियासत यहां आड़े आ गई। सुषमा का जवाब था, आखिरी दिन ही क्यों, इसे पहले क्यों नहीं लाया गया? इन शब्दों के साथ सुषमा ने सोनिया की बात नहीं मानीं।
केंद्रीय महिला विश्वविद्यालय का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में
हालांकि सुषमा ने बाद में सोनिया की तारीफ करते हुए कहा कि हर विवादित मुद्दा बिना उनकी मध्यस्थता के सुलझाया नहीं जा सका। दरअसल यह मामला खुद सोनिया के लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा हुआ था।
रायबरेली में इस यूनिवर्सिटी के लिए यूपीए सरकार ने 500 करोड़ रुपये के शुरुआती फंड का प्रावधान भी कर दिया गया था। यह फंड यूजीसी की ओर से जारी किया जाना था। लेकिन इस यूनिवर्सिटी बिल का संसद में पारित होना जरूरी थी।
यही कारण था कि सोनिया इसे पास कराने के लिए खुद सुषमा के पास गुहार लगाने गईं। लेकिन बात नहीं बनीं और इस तरह देश के पहले केंद्रीय महिला विश्वविद्यालय का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया है।
पढ़ाई के नामांकन में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले पीछे
अब अगर आम चुनाव के बाद यूपीए सत्ता पर काबिज नहीं होती है तो यह पूरी तरह से दूसरी सरकार पर निर्भर करेगा कि वह इस यूनिवर्सिटी को स्थापित करना चाहती है या नहीं। स्थापित करना भी चाहती है तो यह गारंटी भी नहीं है कि इसे रायबरेली में लाया जाएगा या कहीं और।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री जितिन प्रसाद ने बल पारित नहीं किए जाने पर दुख जताते हुए कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है। आखिर विश्वविद्यालय का यह तोहफा यूपी को मिल रहा था, जहां देश में अशिक्षित महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। यह यूनिवर्सिटी उनके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती। फिर देश में महिलाएं पढ़ाई के नामांकन में पुरुषों के मुकाबले 20 फीसदी पीछे हैं।