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यूपीईआरसी अध्यक्ष की नियुक्ति गैर कानूनीः सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 20 Oct 2012 01:16 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष राजेश अवस्थी को झटका देते हुए उन्हें पद से हटाए जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया है। शीर्ष अदालत ने अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जनवरी में अवस्थी की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को गैरकानूनी, शून्य एवं रद्द करार दिया था।
जस्टिस केएस राधाकृष्णन व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने फैसले में कहा कि आयोग के अध्यक्ष पद पर अवस्थी की नियुक्ति में कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को दिए गए फैसले में इस मसले पर उचित फैसला दिया जिसमें हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं है। ऐसे में अदालत राजेश अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज करती है।
मालूम हो कि तत्कालीन मायावती सरकार में आयोग के अध्यक्ष बने अवस्थी के मसले पर हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पहले राज्य सरकार ने भी सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद प्रदेश सरकार की ओर से याचिका को वापस ले लिया गया। सर्वोच्च अदालत ने फैसले में पिछले आदेशों को वापस लेते हुए उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की ओर से दिए गए उस तर्क को जायज माना है जिसमें कहा गया कि अवस्थी की नियुक्ति में विधायी प्रावधानों का अनुसरण नहीं किया गया।
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अवस्थी की याचिका पर 13 जनवरी को शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर नंदलाल की ओर से याचिका दायर की गई थी जिसमें अवस्थी को इस आधार पर पद से हटाने की मांग की गई थी कि वह पहले जेपी पावर में थे और आयोग में अध्यक्ष पद पर आने के बाद वह उसे फायदा पहुंचा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने अवस्थी की याचिका के उन आधारों को नकार दिया जिनमें कहा गया कि हाईकोर्ट का आदेश उचित नहीं है क्योंकि आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति त्रिसदस्यीय समिति की ओर से की जाती है।
इस समिति में हाईकोर्ट के एक जज, राज्य के मुख्य सचिव और विद्युत प्राधिकरण के चेयरमैन शामिल होते हैं। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को राज्य सरकार को संबंधित नियम-कानूनों के तहत आम चुनाव का परिणाम घोषित होने के बाद खुद या फिर चुनाव आयोग से अनुमति लेकर नए सिरे से अध्यक्ष का चयन करने को कहा था। गौरतलब है कि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा था कि बाध्यकारी कर्तव्य का उल्लंघन करते हुए कानूनी प्रावधानों के खिलाफ नियुक्त व्यक्ति को किसी कार्यालय का नेतृत्व करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। यह अवैध प्रक्रिया को बढ़ावा देने जैसा होगा।
जेपी समूह का भला कर गए अवस्थी
सवाल अब यह उठ रहा है कि सरकार को अगले 25 साल तक लगने वाली 30 हजार करोड़ रुपये की चपत का क्या होगा जिसके लिए कायदे-कानून दरकिनार कर अवस्थी को कुर्सी सौंपी गई। अदालत के फैसले से यह तो साफ हो गया कि अवस्थी की नियुक्ति के पीछे मुख्य मकसद जेपी समूह को फायदा पहुंचाना था। बतौर चेयरमैन अवस्थी ने इसे अंजाम भी दे दिया।
खास बात यह है अवस्थी को इस कुर्सी पर बैठाने के लिए विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों को भी दरकिनार कर दिया गया। कानूनन किसी ऐसे व्यक्ति को आयोग का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी ऐसी कंपनी से जुड़ा रहा हो जिसके बारे में उसे निर्णय करना हो। अवस्थी पहले जिस जेपी समूह में थे, चैयरमैन बनने के बाद उन्होंने उसी कंपनी द्वारा प्रदेश में स्थापित किए जाने वाले बिजलीघर की दरों का अनुमोदन किया।
ये थे आरोप
* राजेश अवस्थी को बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन व वितरण का अनुभव नहीं है। वह एनटीपीसी में सिविल इंजीनियर थे, लिहाजा वह नियमानुसार अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की योग्यता नहीं रखते थे।
* जेपी पावर वेंचर्स लि. में उनकी रुचि थी, जिसके वह उपाध्यक्ष थे।
* बतौर नियामक आयोग अध्यक्ष उन्होंने जेपी पावर वेंचर्स के संबंध में निर्णय लिए और अनुचित लाभ दिया।
* जेपी पावर वेंचर्स को बिजली की ऊंची दर दिए जाने से राज्य सरकार को 25 साल में 30 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ेगा।
अवस्थी के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए कोर्ट जाएंगे नंदलाल
लखनऊ। राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष राजेश अवस्थी की नियुक्ति के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले नंदलाल जायसवाल का कहना है कि अब वह अवस्थी के कार्यकाल में किए गए सभी विद्युत खरीद अनुबंध और उनकी अवैध परिसंपत्तियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर जनहित याचिका दाखिल करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जायसवाल ने कहा कि अवस्थी की नियुक्ति में अनियमितता और उनके द्वारा कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने की उनकी आशंका सच साबित हुई।
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जस्टिस केएस राधाकृष्णन व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने फैसले में कहा कि आयोग के अध्यक्ष पद पर अवस्थी की नियुक्ति में कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को दिए गए फैसले में इस मसले पर उचित फैसला दिया जिसमें हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं है। ऐसे में अदालत राजेश अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज करती है।
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मालूम हो कि तत्कालीन मायावती सरकार में आयोग के अध्यक्ष बने अवस्थी के मसले पर हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पहले राज्य सरकार ने भी सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद प्रदेश सरकार की ओर से याचिका को वापस ले लिया गया। सर्वोच्च अदालत ने फैसले में पिछले आदेशों को वापस लेते हुए उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की ओर से दिए गए उस तर्क को जायज माना है जिसमें कहा गया कि अवस्थी की नियुक्ति में विधायी प्रावधानों का अनुसरण नहीं किया गया।
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अवस्थी की याचिका पर 13 जनवरी को शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर नंदलाल की ओर से याचिका दायर की गई थी जिसमें अवस्थी को इस आधार पर पद से हटाने की मांग की गई थी कि वह पहले जेपी पावर में थे और आयोग में अध्यक्ष पद पर आने के बाद वह उसे फायदा पहुंचा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने अवस्थी की याचिका के उन आधारों को नकार दिया जिनमें कहा गया कि हाईकोर्ट का आदेश उचित नहीं है क्योंकि आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति त्रिसदस्यीय समिति की ओर से की जाती है।
इस समिति में हाईकोर्ट के एक जज, राज्य के मुख्य सचिव और विद्युत प्राधिकरण के चेयरमैन शामिल होते हैं। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को राज्य सरकार को संबंधित नियम-कानूनों के तहत आम चुनाव का परिणाम घोषित होने के बाद खुद या फिर चुनाव आयोग से अनुमति लेकर नए सिरे से अध्यक्ष का चयन करने को कहा था। गौरतलब है कि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा था कि बाध्यकारी कर्तव्य का उल्लंघन करते हुए कानूनी प्रावधानों के खिलाफ नियुक्त व्यक्ति को किसी कार्यालय का नेतृत्व करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। यह अवैध प्रक्रिया को बढ़ावा देने जैसा होगा।
जेपी समूह का भला कर गए अवस्थी
सवाल अब यह उठ रहा है कि सरकार को अगले 25 साल तक लगने वाली 30 हजार करोड़ रुपये की चपत का क्या होगा जिसके लिए कायदे-कानून दरकिनार कर अवस्थी को कुर्सी सौंपी गई। अदालत के फैसले से यह तो साफ हो गया कि अवस्थी की नियुक्ति के पीछे मुख्य मकसद जेपी समूह को फायदा पहुंचाना था। बतौर चेयरमैन अवस्थी ने इसे अंजाम भी दे दिया।
खास बात यह है अवस्थी को इस कुर्सी पर बैठाने के लिए विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों को भी दरकिनार कर दिया गया। कानूनन किसी ऐसे व्यक्ति को आयोग का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी ऐसी कंपनी से जुड़ा रहा हो जिसके बारे में उसे निर्णय करना हो। अवस्थी पहले जिस जेपी समूह में थे, चैयरमैन बनने के बाद उन्होंने उसी कंपनी द्वारा प्रदेश में स्थापित किए जाने वाले बिजलीघर की दरों का अनुमोदन किया।
ये थे आरोप
* राजेश अवस्थी को बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन व वितरण का अनुभव नहीं है। वह एनटीपीसी में सिविल इंजीनियर थे, लिहाजा वह नियमानुसार अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की योग्यता नहीं रखते थे।
* जेपी पावर वेंचर्स लि. में उनकी रुचि थी, जिसके वह उपाध्यक्ष थे।
* बतौर नियामक आयोग अध्यक्ष उन्होंने जेपी पावर वेंचर्स के संबंध में निर्णय लिए और अनुचित लाभ दिया।
* जेपी पावर वेंचर्स को बिजली की ऊंची दर दिए जाने से राज्य सरकार को 25 साल में 30 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ेगा।
अवस्थी के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए कोर्ट जाएंगे नंदलाल
लखनऊ। राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष राजेश अवस्थी की नियुक्ति के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले नंदलाल जायसवाल का कहना है कि अब वह अवस्थी के कार्यकाल में किए गए सभी विद्युत खरीद अनुबंध और उनकी अवैध परिसंपत्तियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर जनहित याचिका दाखिल करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जायसवाल ने कहा कि अवस्थी की नियुक्ति में अनियमितता और उनके द्वारा कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने की उनकी आशंका सच साबित हुई।