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आय से अधिक संपत्ति मामले में माया को सुप्रीम कोर्ट से राहत
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Thu, 08 Aug 2013 11:30 AM IST
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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है।
कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में दायर पुनर्विचार याचिका को गुरूवार को अपने फैसले में खारिज कर दिया।
इस मामले में अदालत ने एक मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने छह जुलाई, 2012 को मायावती को राहत दी थी। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कि पहले जो आदेश दिया गया था। उसमें मायावती की संपत्ति के मामले की जांच को लेकर मेरिट पर फैसला नहीं दिया गया था।
ताज कॉरिडोर मामले की जांच के दौरान आय से अधिक संपत्ति की एफआईआर को निरस्त किया गया था। पीठ ने कहा था कि मामले में दर्ज एफआईआर को इसलिए रद्द किया था, क्योंकि एजेंसी ताज कॉरिडोर मामले में अदालत की ओर से दिए गए आदेश को समुचित तरीके से समझे बिना ही बसपा नेता के खिलाफ कार्यवाही कर रही थी।
फैसले में मायावती के संपत्ति मामले को अलग से आगे बढ़ाए जाने की सीबीआई के अधिकार को नहीं छीना गया था।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर उत्तर प्रदेश के निवासी कमलेश वर्मा ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने छह जुलाई, 2012 को फैसला देने से पहले उसका पक्ष नहीं सुना था।
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कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में दायर पुनर्विचार याचिका को गुरूवार को अपने फैसले में खारिज कर दिया।
इस मामले में अदालत ने एक मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने छह जुलाई, 2012 को मायावती को राहत दी थी। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कि पहले जो आदेश दिया गया था। उसमें मायावती की संपत्ति के मामले की जांच को लेकर मेरिट पर फैसला नहीं दिया गया था।
ताज कॉरिडोर मामले की जांच के दौरान आय से अधिक संपत्ति की एफआईआर को निरस्त किया गया था। पीठ ने कहा था कि मामले में दर्ज एफआईआर को इसलिए रद्द किया था, क्योंकि एजेंसी ताज कॉरिडोर मामले में अदालत की ओर से दिए गए आदेश को समुचित तरीके से समझे बिना ही बसपा नेता के खिलाफ कार्यवाही कर रही थी।
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फैसले में मायावती के संपत्ति मामले को अलग से आगे बढ़ाए जाने की सीबीआई के अधिकार को नहीं छीना गया था।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर उत्तर प्रदेश के निवासी कमलेश वर्मा ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने छह जुलाई, 2012 को फैसला देने से पहले उसका पक्ष नहीं सुना था।
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