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बसपा दफ्तर के लिए हुए खेल पर सुप्रीम कोर्ट चकित

Sun, 14 Oct 2012 10:20 PM IST
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय Updated Sun, 14 Oct 2012 10:20 PM IST
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Supreme Court surprised at the game  of BSP office
बहुजन समाज पार्टी को कार्यालय मुहैया कराने के लिए शहीद स्मारक ट्रस्ट को सरकारी स्थान से बेदखल करने के प्रशासनिक खेल पर सुप्रीम कोर्ट भी अचरज में है। ट्रस्ट के आरोप को हल्के में लेने पर सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हर मसले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अदालत को उसे परखकर आदेश जारी करना चाहिए। यह बहुत ही गंभीर मसला है जिसमें ट्रस्ट के पदेन पदाधिकारी (एक्स ऑफिशियो) होने का फायदा उठाते हुए जिलाधिकारी ने पूरी कहानी बनाई और ट्रस्ट को मिले सरकारी स्थान के आवंटन को रद्द कर दिया।
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सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए शहीद स्मारक ट्रस्ट की रिट याचिका पर नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश जारी किया है। इस ट्रस्ट का गठन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती पर बलिया में 19 अगस्त, 1992 को आयोजित समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की घोषणा के बाद हुआ था। इस ट्रस्ट के पहले चेयरमैन और ट्रस्टी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर थे। इसके अन्य सदस्यों में जिलाधिकारी (डीएम) को पदेन पदाधिकारी के तौर पर सचिव का पद हासिल है।
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ट्रस्ट के मुताबिक इसी हैसियत डीएम ने 28 फरवरी, 2009 को सरकार को एक पत्र लिखा। इस पत्र में ट्रस्ट के दोनों भवनों को खाली कराने की गुजारिश की गई। शीर्ष अदालत ने ट्रस्ट के आरोप को अपने फैसले में दर्ज किया है कि इस दौरान बसपा को कार्यालय के लिए जगह नहीं मिल रही थी। यही वजह थी ट्रस्ट में पदेन पदाधिकारी होने का फायदा उठाते हुए डीएम ने खुद ही पत्र लिखने के बाद ट्रस्ट को मिले सरकारी भवनों के आवंटन को रद्द कर दिया। यही नहीं 15 मई, 09 को अन्य अधिकारियों और पुलिस के साथ जाकर इन स्थानों को सील कर दिया।
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सर्वोच्च अदालत के फैसले के मुताबिक हाईकोर्ट ने इस मामले में सील हटाने का आदेश तो जारी कर दिया। लेकिन हाईकोर्ट ने दूसरे पक्ष से जवाब तलब किए बगैर ही मामले पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि ट्रस्ट का सरकारी स्थान पर निजी अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालतों को हर मसले पर बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए उसकी गंभीरता को परखना चाहिए। मुद्दे पर पूरी तरह से विचार किए जाने और सभी पक्षों को सुने जाने के बाद ही स्पष्ट आदेश दिया जाना चाहिए। यह बहुत ही गंभीर मामला है। पीठ ने कहा कि वह हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए उसे इस मसले पर नए सिरे से सुनवाई कर निर्णय लेने का निर्देश जारी करती है।
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