रेलवे को मिली सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत
रेलयात्रियों पर बैक डोर से वित्तीय भार देने के चलते निशाने पर आई मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि समय के साथ-साथ भाड़ों में बढ़ोतरी जरूरी है। हालांकि यह बढ़ोतरी व्यावहारिक होनी चाहिए। न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने कहा कि अगर सरकार को ऐसा लगता है कि रेल के भाड़ों में फेरबदल जरूरी है तो वह ऐसा कर सकती है।
लेकिन इस बात का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए कि भाड़े व्यावहारिक हो। अदालत ने कहा है कि सरकार वित्तीय फायदे के लिए ऐसा कर सकती है। घाटे से उबरने के लिए ऐसा किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी रेलवे द्वारा रेलगाड़ी को पार्सल वैन के कुछ हिस्सों को व्यापारी, ठेकेदार आदि को लीज पर देने के सरकार के निर्णय पर दी है।
शीर्ष अदालत कहा कि सरकार मुनाफे के लिए ऐसा कर सकती है। हालांकि इस तरह की लीज देने का निर्णय व्यावहारिक होना चाहिए और समझदारी केसाथ लिया गया निर्णय होना चाहिए जिससे कि अधिक से अधिक मुनाफा संभव हो।
क्या था मामला
नई दिल्ली से बंगलुरू के बीच चलने वाली कर्नाटक एक्सप्रेस
के पार्सल वैन का एक बड़ा हिस्सा आमतौर पर खाली रहता था, जिससे रेलवे को
नुकसान उठाना पड़ रहा था। लिहाजा नुकसान से उबरने के लिए रेलवे ने पार्सल
वैन के कुछ हिस्सों को लीज पर व्यापारी या ठेकेदार आदि को देने का निर्णय
लिया था।
जिसके तहत वर्ष 2000 में यह ठेका एक कंपनी को दो वर्ष के लिए लीज
पर दिया गया। यह कंपनी व्यापारियों से माल ढुलाई के लिए बहुत अधिक रकम
वसूलता था। इस कंपनी पर आरोप था कि वह अंगूर की ढुलाई के लिए आठ रुपये
प्रति किलो व्यापारियों से लेता था जबकि रेलवे उनसे महज 2.30 रुपये प्रति
किलो लेता था।
जिसके बाद व्यापारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पार्सल वैन के कुछ हिस्सों को ठेके पर देने का जायज
ठहराया है लेकिन कहा है कि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ठेकेदार लोगों से
मनमाने पैसे वसूल करें। शीर्ष अदालत ने रेलवे को माल ढुलाई की अधिकतम कीमत
तय करने के लिए कहा है। ठेकेदार को इस कीमत से अधिक वसूलने की इजाजत नहीं
होगी।