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दिल्ली गैंगरेपः नाबालिग आरोपी समाज के लिए खतरा

Sat, 19 Jan 2013 09:27 AM IST
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली Updated Sat, 19 Jan 2013 09:27 AM IST
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supreme court issues notices to centre on pil seeking normal trial for juvenile accused

दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षीय युवती के साथ हुई दरिंदगी मामले में शामिल किशोर (जूवेनाइल) को अन्य आरोपियों की तरह सजा दिलाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में किशोर न्याय अधिनियम की धारा 16 को अवैध घोषित किए जाने की मांग की गई है, क्योंकि इसी के तहत किशोर आरोपियों का सजा से बचाव होता है। साथ ही कहा गया है कि इस आरोपी का खुलेआम घूमना महिलाओं और समाज के लिए खतरा है।

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जस्टिस केएस राधाकृष्णन व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने सलिल बाली समेत तीन याचिकाओं पर गृह, कानून और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जवाब तलब किया है। पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि 16 दिसंबर के सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में शामिल किशोर ने जिस तरह का बर्बर कृत्य किया है, उससे यह संभावना बनती है कि वह सामान्य नहीं है। इस उम्र में इस तरह के अपराध को ध्यान में रखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि वह समाज के लिए खतरा है।
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उन्होंने कहा कि यह किशोर कुछ ही दिनों में वयस्क हो जाएगा। जूवेनाइल होने पर वह जल्द छूट जाएगा और फिर खुलेआम घूमेगा। न्याय के हित को ध्यान में रखते हुए ऐसे किशोर को भी अन्य आरोपियों की सजा दी जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो पूरी तरह से न्याय नहीं मिल पाएगा।
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सीबीआई को मिले सही उम्र का पता लगाने की जिम्मेदारी
याचिका में किशोर की जांच के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कम से कम तीन मनोवैज्ञानिकों का दल नियुक्त करने की मांग की गई है, जो यह स्पष्ट कर सकें कि आरोपी जूवेनाइल है या नहीं। यदि किशोर को मनोरोगी पाया जाता है तो उसे खुलेआम घूमने का मौका न देते हुए विशेष अभिरक्षा में रखने का आदेश दिया जाना चाहिए।

उसकी सही उम्र का पता लगाने की जिम्मेदारी सीबीआई जैसी एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। महज स्कूल प्रमाण पत्र के आधार पर उसे किशोर नहीं माना जाना चाहिए। इसके लिए सौ प्रतिशत साक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए क्योंकि आमतौर पर लोग स्कूल में बच्चों की जन्म तिथि दो साल कम लिखाते हैं।

अधिवक्ता ने कहा कि इस आरोपी का खुलेआम घूमना महिलाओं और समाज के लिए खतरा है। वह ऐसी वारदातों को दोबारा अंजाम दे सकता है। उसे किशोर न्याय अधिनियम-2000 की धारा 16 के तहत बिना सजा के ही सुधार गृह में रखकर छोड़ दिया जाएगा। जबकि ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले को इस श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।


उन्होंने कहा कि अदालत को मूल अधिकार के सिद्धांतों के विपरीत अधिनियम की धारा 16 को अवैध घोषित कर देना चाहिए। याचिका में अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च अदालत को प्राप्त अपरिहार्य शक्ति के तहत न्याय देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अदालत अपनी शक्ति से इस किशोर को कानून में तय की गई सजा से ज्यादा सजा दिलाए, ताकि अन्य नागरिक अधिकारों को संरक्षित किया जा सके।

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