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कानून की लकीर नहीं कर सकी बाप-बेटी को जुदा

Mon, 05 Nov 2012 08:51 AM IST
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली Updated Mon, 05 Nov 2012 08:51 AM IST
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supreme court has given daughter custody to her father

रिश्तों की बागडोर कानून के जरिए नहीं खींची जा सकती है। नौ साल की एक बच्ची के संरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पिता को उसकी जिम्मेदारी सौंप कर यह साफ कर दिया है। क्योंकि कानूनन लड़की का संरक्षण मां को ही मिलता है, लेकिन बाप-बेटी के बीच अटूट प्यार के आगे कानून भी लकीर नहीं खींच सका। मां के प्रति अलगाव को बच्ची ने अपने व्यवहार से जाहिर कर दिया तो सर्वोच्च अदालत को भी कानूनी हिदायतों से इतर जाकर फैसला देना पड़ा।

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सर्वोच्च अदालत ने श्रेष्ठा नाम की इस बच्ची के हितों के मसले पर समझौता केंद्र की रिपोर्ट में दी गई राय के आधार पर यह आदेश जारी किया है। समझौता अधिकारी को माता-पिता के अलगाव से दुखी श्रेष्ठा के मन की बात जानने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़े। बच्ची को वह अपने घर ले गया, जहां श्रेष्ठा की हमउम्र बेटियां उससे घुल-मिल गईं। इसके बाद कई बार शॉपिंग मॉल के चक्कर लगाने पड़े।
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इस दौरान समझौता अधिकारी को यह पता चला कि श्रेष्ठा अपने पिता, दादी और बाबा के साथ खुश है। जबकि अपनी मां के साथ वह दो मिनट भी नहीं रहना चाहती। क्योंकि मां के साथ वह खुद को असुरक्षित महसूस करती है। कानून भले ही लड़की का संरक्षण मां को प्रदान किए जाने की प्राथमिकता देता है। लेकिन मां की तुलना में श्रेष्ठा का रिश्ता उसके पिता, दादा-दादी से काफी गहरा है।  
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जस्टिस पी. सदाशिवम् व जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने मां मीनाक्षी की ओर से दायर याचिका पर कहा कि समझौता अधिकारी की राय उचित है। हाईकोर्ट ने भी उसी के आधार पर आदेश जारी किया जो बिल्कुल सही है। अदालत को उसमें किसी प्रकार के बदलाव या संशोधन की जरूरत महसूस नहीं होती। मां को बच्ची से हर माह दो बार मुलाकात और साथ रहने का अधिकार दिया गया है। वह शनिवार और रविवार या फिर त्यौहार के दिन अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है।
 
इसके अलावा मां रोजाना बच्ची से सुबह शाम मिल सकती है। बच्ची श्रेष्ठा के हितों को ध्यान में रखते हुए उसका संरक्षण पिता को दिया गया है। उसके लड़की होने की निजता का ख्याल उसकी दादी रख सकती हैं। जबकि वह अपनी मां के साथ रहना ही नहीं चाहती, क्योंकि वह खुद को असुरक्षित महसूस करती है।


सर्वोच्च अदालत ने कानून से परे हटकर इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को जारी रखा जो समझौता केंद्र की रिपोर्ट के आधार पर नंवबर, 2010 में जारी किया गया। जबकि फैमिली कोर्ट ने बच्ची के संरक्षण की जिम्मेदारी मां को प्रदान की थी।

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