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SC में पेटेंट अर्जी खारिज, कैंसर दवाएं नहीं होंगी महंगी
नई दिल्ली/कृष्ण कुमार सिंह
Updated Mon, 01 Apr 2013 04:44 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने स्विटजरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस की पेटेंट अर्जी खारिज करते हुए उसे ग्लिवेक का पेटेंट देने से इनकार कर दिया है। जानकारों का कहना है कि अदालत के इस फैसले से अब कैंसर की दवाएं महंगी नहीं होंगी।
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ल्यूकीमिया और अन्य कैंसर में इलाज
ग्लिवेक का इस्तेमाल ल्यूकीमिया (ब्लड कैंसर का ही एक प्रकार) और अन्य कैंसर के इलाज में किया जाता है। ग्लिवेक की एक महीने डोज की कीमत करीब 1,30,000 रुपये है। वहीं भारत में इसका जेनरिक संस्करण के डोज कीमत हर महीने 9000 रुपये पड़ती है।
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अदालत का कहना है कि एक दवा के लिए दोबारा पेटेंट नहीं दिया जा सकता है। कंपनी ने पेटेंट एक्ट के तहत इनोवेशन टेस्ट पास नहीं किया है, ऐसे में ग्लिवेक पर सेक्शन 3(डी) लागू नहीं होता है।
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पेटेंट मामलों के सेक्शन 3(डी) के तहत किसी भी कंपनी की एक दवा का पेटेंट बार-बार नहीं मिलेगा।
दरअसल नोवार्टिस चाहती थी कि कैंसर की नई 'दवा' के लिए कंपनी को पेटेंट दिया जाए। वहीं भारतीय अधिकारियों का कहना था कि दवा का नया संस्करण उसकी पुरानी दवा से बहुत अलग नहीं है।
अदालत ने नोवार्टिस की भारतीय दवा कंपनियों को जेनेरिक दवाओं के उत्पादन रोकने संबंधी अपील को भी खारिज कर दिया।
नोवार्टिस फार्मा कंपनी
नोवार्टिस फार्मा क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनी है। यह इंसानों से लेकर जानवरों तक की दवाएं बनाती है। यह कंपनी 1996 में सीबा-गेगी और सैंडोज के विलय के बाद वजूद में आई। इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड के बासेल में है।
ग्लिवेक
नोवार्टिस ने 20 साल पहले ग्लिवेक को बाजार में उतारा था, तभी से इसे क्त्रॉनिक माइलॉयड ल्यूकेमिया की अच्छी दवा माना जाता है। इसकी कीमत करीब 2600 डॉलर यानी करीब एक लाख तीस हज़ार प्रति महीना है। जबकि भारत में इसका जेनरिक संस्करण करीब नौ हजार रुपये में मिलता है।
क्या है विवाद
नोवार्टिस की दवा ग्लिवेक जो कैंसर व पेट में होने वाले ट्यूमर के लिए कारगर बताई जाती है। 2003 में नोवार्टिस को इस दवा की मार्केटिंग के अधिकार पांच साल तक के लिए मिले।
यह दवा जनवरी 2005 में बाजार में आ गई। चूंकि अब इस दवा पर नोवार्टिस का ही एकाधिकार था, इसके चलते दवा की कीमत 10 हजार रुपये से अचानक लाख रुपये तक पहुंच गई।
भारतीय कंपनियों ने इसके विरोध में अदालत की शरण ली और बताया कि ग्लिवेक दरअसल एक पुरानी दवा का ही सुधरा संस्करण है, जो पेटेंट अधिनियम की नवीनता वाले प्रावधान पर खरा नहीं उतरता।
कॉम्पट्रॉलर जनरल ऑफ पेटेंट ऐंड डिजाइन ने भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3 (डी) और 3 (बी) के तहत कई मानदंडों को पूरा नहीं करने समेत कई आधार पर ग्लाइवेक का पेटेंट करने से इनकार किया। धारा 3 (डी पहले से जानकारी में आई ड्रग्स के पेटेंट को रोकती है।
इस तरह के मामले में तभी पेटेंट किया जा सकता है, जब नई दवा सुपीरियर हो। वहीं, धारा 3(बी) उन प्रॉडक्ट के पेटेंट को रोकती है, जो सार्वजनिक हितों के खिलाफ हो और मौजूदा प्रॉडक्ट की तुलना में कोई सुपीरियर क्षमता का प्रदर्शन न करता हो।
जनवरी 2006 में चेन्नई के पेटेंट ऑफिस ने नोवार्टिस के इस पेटेंट आवेदन को इसी बुनियाद पर खारिज कर दिया।
मामला अदालत में
--नोवार्टिस ने अपीलेट बोर्ड के आदेश को चेन्नई हाईकोर्ट में कोर्ट में चुनौती दी।
6 अगस्त, 2007: मद्रास हाइकोर्ट ने भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3 (डी) को चुनौती देने वाली नोवार्टिस की एक याचिका को खारिज कर दी। कंपनी ने अपनी पुरानी दवाओं में मामूली सुधार करके उनके लिए अलग से पेंटेट जारी करने की मांग की थी।
4 दिसंबर, 2012: जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने नोवार्टिस की याचिका पर करीब ढाई महीने की सुनवाई के बाद कहा कि इस मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा।
01 अप्रैल, 2013: सुप्रीम कोर्ट ने स्विट्जरलैंड की दवा कंपनी नोवार्टिस एजी की कैंसर रोधी दवा ग्लिवेक के पेटेंट से संबंधित याचिका खारिज कर दी।