सुप्रीम कोर्ट पर्सनल लॉ की वैधता की जांच नहीं कर सकता है: जमायत
मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव समेत अन्य मामलों से जुड़ी एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा ए हिंद को पक्ष बनाने की मंजूरी दे दी है। जमायत ने कहा था कि अदालत पर्सनल लॉ की वैधता की जांच नहीं कर सकती है।
तलाक या पति द्वारा एक से ज्यादा शादी करने के मामले में मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव से जुड़े मसलों का सुप्रीम कोर्ट ओर से परीक्षण करने के सवाल पर मुस्लिम समूह जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने एतराज जताया है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल पर जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने याचिका दाखिल कर कहा कि इस मामले को न्यायिक परीक्षण के दायरे में नहीं लाना चाहिए।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने जमीयत-उलेमा-ए-हिंद को इस मामले में हस्तक्षेप की इजाजत देते हुए अटॉर्नी जनरल और नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (नालसा) को नोटिस जारी किया है। पीठ ने केंद्र सरकार और संस्था को छह हफ्ते में जवाब दाखिल करने केलिए कहा है।इस मामले में अदालत ने स्वत: संज्ञान लिया था।
पर्सनल लॉ बोर्ड से मांगी राय
जमीयत-उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि यह मसला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा हुआ है, ऐसे में मुस्लिम समुदाय के नजरिये पर भी विचार किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया कि उनके समूह का मुख्य उद्देश्य इस्लाम की परंपरा और संस्कृति का संरक्षण करना है इसलिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठे इन मुद्दों पर उनका विचार लिया जाना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह के मसले पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट गौर कर चुका है। अहमदाबाद विमेन एक्शन ग्रुप मामले में भी मुस्लिमों में बहुविवाह जायज है या नहीं है का सवाल उठा था। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम पुरुष को बिना पत्नी की सहमति से तलाक लेने के औचित्य और संविधान के अनुच्छेद-13,14 और 15 केतहत की इसकी वैधता से जुड़े सवाल भी उठे थे।
मुस्लिम पुरुषों द्वारा एक से अधिक पत्नी रखने को निष्ठुरता करार देने जैसे सवाल भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आए थे। लेकिन शीर्ष अदालत ने यह कहते हुए इस पर निरीक्षण करने से इनकार कर दिया था कि इन सब पर निर्णय लेना विधायिका का काम है। इसकेअलावा याचिका में कई अन्य मामलों का भी हवाला दिया गया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि मुस्लिम लॉ वास्तव में कुरान पर आधारित हैं, लिहाजा यह संविधान केअनुच्छेद- 13 केदायरे में नहीं आता।