'क्या समान नागरिक संहिता चाहती है सरकार?'
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या वह देश में समान नागरिक संहिता लाने को इच्छुक है या नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसको लेकर भ्रम की स्थिति है।
न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि वह समान नागरिक संहिता बनाने की दिशा में क्या कर रही है, जिससे कि विभिन्न धर्मों के कानूनी प्रावधान एक समान हों। पीठ ने कहा कि इसे लेकर भ्रम की स्थिति है। हमें समान नागरिक संहिता पर काम करना चाहिए।
पीठ ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आखिर हो क्या रहा है। अब तक क्यों नहीं नियम बनाया गया और क्यों नहीं इसका क्रियान्वयन हुआ।
मालूम हो कि पिछली सुनवाई के केंद्र सरकार ने कहा था कि वह तलाक अधिनियम की धारा-10 ए (1) में संशोधन करने के लिए तैयार है।
अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें उस प्रावधान को चुनौती दी गई है जिसके तहत ईसाई दंपति को आपसी सहमति से तलाक लेने से पहले कम से कम दो वर्ष तक अलग रहने की अनिवार्यता है जबकि दूसरे धर्म के लिए एक वर्ष की अनिवार्यता है।
सरकार को तीन हफ्ते में देना होगा जवाब
सोमवार को केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने पीठ को बताया कि सरकार अधिनियम में संशोधन का प्रयास कर रही है। पीठ को यह बात नागवार गुजरी कि पिछले करीब तीन महीने से सरकार ऐसा कह रही है।
सरकार के रुख से खफा पीठ ने अदालत कक्ष में मौजूद सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार से इस बारे पूछा। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह इस मामले से अनभिज्ञ हैं।
उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ समय दिया जाए, जिससे वह पीठ की मदद कर सकें। जिसके बाद पीठ ने सॉलिसिटर जनरल को तीन हफ्ते के भीतर यह बताने के लिए कहा कि समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार का क्या रुख है।