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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या दोषी को दे सकते हैं राहत

Mon, 22 Oct 2012 07:41 AM IST
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली Updated Mon, 22 Oct 2012 07:41 AM IST
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supreme court ask about article 7 of juvenile law to uttarakhand govt

सुप्रीम कोर्ट सजा का फैसला जारी करने के बाद क्या किशोर न्याय अधिनियम की धारा-7 अ के तहत किसी दोषी को राहत दे सकता है। क्योंकि दोषी पहले अदालत के संज्ञान में यह नहीं ला पाया कि जुर्म को अंजाम देने के समय वह नाबालिग था। सर्वोच्च अदालत ने उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी करते हुए इस सवाल पर विचार करने का निर्णय लिया है। इस मसले पर हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा भुगत रहे विनोद कुमार ने शीर्षस्थ अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

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जस्टिस केएस राधाकृष्णन व जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने जुलाई, 1985 में हत्या के मामले में दोषी करार दिए गए विनोद की याचिका पर राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब तलब किया है। पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता डीके गर्ग ने तर्क दिया कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 7 अ के तहत शीर्षस्थ अदालत जूवेनाइल के मामले पर किसी भी स्टेज पर विचार करने का निर्णय ले सकता है। भले ही सर्वोच्च अदालत की ओर से उसकी सजा को बरकरार रखा गया हो।
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गर्ग ने पीठ को बताया कि घटना जुलाई, 1985 में हुई थी। उस दौरान मेरा मुवक्किल 16 साल छह दिन का था। उसकी अपील 2007 में शीर्षस्थ अदालत के समक्ष आई थी जिसका दिसंबर, 08 में निपटारा कर दिया गया था। मगर आरोपी के जुर्म के समय किशोर होने का मुद्दा बहुत देर में उठाया गया। जबकि स्कूल छोड़ने का प्रमाण-पत्र भी सर्वोच्च अदालत में उस दौरान पेश किया गया था।
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पीठ ने कहा कि यह सवाल बहुत अहम है, लेकिन आरोपी की ओर से यह दावा पहले क्यों नहीं किया गया। जवाब में गर्ग ने कहा कि जुलाई, 2006 में विनोद के बयान का उल्लेख हाईकोर्ट ने अपने फैसले में किया है जिसमें उसने जुर्म के समय किशोर होने का दावा किया था। मगर हाईकोर्ट ने अपने फैसले के खिलाफ पुनर्निरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया। गुजारिश है कि शीर्षस्थ अदालत इस मुद्दे पर विचार कर अब साढ़े सात साल जेल में बिता चुके मेरे मुवक्किल को राहत दे। पीठ ने अधिवक्ता के तर्क से सहमति जताते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिया।

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