सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार आमने-सामने
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा है कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से कोलेजियम प्रणाली की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग लाने का निर्णय इसकी वैधानिकता का एकमात्र आधार नहीं हो सकता है।
अदालत ने कहा कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए हर निर्णय को सीधे तौर पर मंजूर नहीं किया जा सकता और अगर इसे चुनौती दी गई तो न्यायिक परीक्षण किया जाएगा।
न्यायमूर्ति एआर दवे की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह तब कहा जब केंद्र की ओर से पेश अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी इस बात पर लगातार जोर दे रहे थे कि संवैधानिक संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का निर्णय संसद ने सर्वसम्मति से लिया है।
चुनौती दी गई तो न्यायिक परीक्षण किया जाएगा
इतना ही नहीं 20 राज्यों ने भी इस पर मुहर लगा दी है। पीठ ने सवाल किया कि फर्ज कीजिए अगर कल संसद संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) को हटाने का निर्णय लेती है तो क्या हम कह सकते है कि यह ठीक है क्योंकि संसद ने सर्वसम्मति से यह फैसला लिया है।
पीठ ने कहा कि हम इससे इत्तेफाक नहीं रखते। इस पर अटार्नी जनरल ने एक बार फिर दोहराया कि कोलेजियम सिस्टम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता से नहीं जोड़ा जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग को वैधानिक चुनौती अभी नहीं दी जा सकती है।
अभी इसे सरकार ने अधिसूचित नहीं किया है। अधिसूचना जारी होने के बाद ही इसे चुनौती दी जा सकती है। अदालत ने सुनवाई अगले मंगलवार तक के लिए टालते हुए कहा कि कोई भी उच्च न्यायालय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई न करें।
एससीबीए केंद्र सरकार के साथ
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने सुनवाई के दौरान कहा कि एसोसिएशन राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के पक्ष में है। वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन इसका विरोध कर रही है। मालूम हो कि एससीबीए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की पैरेंट बॉडी है।