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अखिलेश सरकार को फिर सुप्रीम कोर्ट की फटकार

Wed, 21 Jan 2015 12:59 PM IST
Updated Wed, 21 Jan 2015 12:59 PM IST
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supreme court against scold akhilesh yadav government

सर्वोच्च अदालत ने मंगलवार को मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान गैंगरेप के मामलों में उसके आदेश का पालन नहीं किए जाने पर उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार को जमकर फटकार लगाई।

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एक अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि सरकार ने जानबूझकर आदेश का पालन नहीं किया। हालांकि अदालत ने इस संबंध में कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया।
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साथ ही अदालत ने प्रदेश सरकार से पूछा कि आरोपियों की जमानत रद्द करने को लेकर अब तक क्या प्रयास किए गए। न्यायाधीश वी. गोपाल गौड़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को डांट लगाते हुए पूछा कि आदेश के पालन में देरी क्यों हुई।
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इतने गंभीर मामले में अदालत के निर्देशों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया। इस पर सरकार की ओर से पेश एडवोकेट जनरल गौरव भाटिया ने कहा कि हमने अदालत के हर आदेश का पालन किया है।

'25 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके'

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उन्होंने बताया कि सभी 25 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। गिरफ्तारी में देरी का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि दंगों के दौरान एसआईटी के पास करीब 5000 मामलों की जांच का जिम्मा था।

गैंगरेप के आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस ने कुल 180 जगहों पर छापे मारे। विशेष टीम का गठन किया गया, जिसकी निगरानी वरिष्ठ अधिकारी कर रहे थे। भाटिया ने यह भी कहा कि गांवों में छापेमारी के दौरान पुलिस टीम को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ता था।

फिर से कोई दंगा न हो, इसको ध्यान में रखते हुए सख्त कार्रवाई करना पुलिस के लिए मुश्किल था। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील कामिनी जायसवाल ने कहा कि राज्य सरकार ने अदालती आदेशों का पालन करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। अवमानना याचिका दाखिल होने के बाद सरकार थोड़ी हरकत में आई।

'राज्य सरकार ने इसका विरोध नहीं किया'

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उन्होंने यह भी कहा कि दो आरोपियों को जमानत भी मिल चुकी है लेकिन राज्य सरकार ने उनकी जमानत रद्द कराने का कोई प्रयास नहीं किया। जवाब में एडवोकेट जनरल ने कहा कि सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में याचिका दाखिल करेगी। इस पर शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से कहा कि उच्च न्यायालय में सरकार की ओर से सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का हवाला क्यों नहीं दिया गया।

साथ ही अदालत ने यह भी पूछा कि इतने गंभीर अपराध में आरोपियों को जमानत मिल गई लेकिन राज्य सरकार ने इसका विरोध नहीं किया। जमानत को रद्द करने का ख्याल दो महीने बाद क्यों आया। सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को दो हफ्ते के भीतर यह बताने के लिए कहा है कि वह आरोपियों की जमानत रद्द करने की दिशा में क्या प्रयास कर रही है।

अदालत की डांट

पीठ ने कहा कि अगर पुलिस को कार्रवाई करने में परेशानी आ रही थी तो राज्य सरकार ने अदालत के आदेश का पालन करने के लिए और समय क्यों नहीं मांगा। राज्य सरकार की ओर से इस बारे में र्कोई याचिका दाखिल नहीं हुई और न ही कोई शिकायत की गई। प्रथम दृष्टया यह अवमानना का मामला दिखता है।

सरकार का जवाब, कानूनी प्रक्रिया से हुई देरी
उत्तर प्रदेश सरकार के एडवोकेट जनरल ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से देरी नहीं हुई है। कानूनी प्रक्रिया की वजह से देरी हुई है। अदालत के हर आदेश का पालन किया गया। चाहे वह पीड़िताओं को मुआवजा देने की बात हो या उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की। पीड़िताओं के जख्म भरने में राज्य सरकार की कोशिशें सराहनीय रही हैं।

मुझे बेवजह बलि का बकरा बनाया जा रहा

मामले की पूर्व जांच अधिकारी माला यादव ने अदालत के समक्ष कहा कि इस मामले में उसे बेवजह बलि का बकरा बनाया जा रहा है। उनकी ओर से पेश वकील ने कहा कि पीड़िता के बार-बार बयान बदलने के कारण उन्हें एक मामला बंद करना पड़ा था।

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