तमिलनाडु की राजनीति के महानायक एमजीआर
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एमजी रामचंद्रन यानी मारुदुर गोपालन रामचंद्रन को अपना प्रभामंडल कायम रखना आता था। तमिल फिल्म और फिर वहां की राजनीति में केवल उनका वर्चस्व रहा। फिल्मों से राजनीति में वह किसी नए नारे के साथ नहीं आए थे। सामाजिक विसंगति, गरीबी, तमिल-द्रविड़ और भाषाई आंदोलन की जिन बातों को तमिल समाज पिछले डेढ़ दशक से सुनता आ रहा था, एमजी रामचंद्रन ने जमीनी स्तर पर उसके लिए संघर्ष किया। उन्होंने भी बचपन में गरीबी देखी थी। के. कामराज के शिक्षा सुधार और अन्नादुरई के सामाजिक विसंगतियों से लड़ने की अद्भुत क्षमता से प्रभावित एमजीआर ने इसे अपनी राजनीति का आधार बनाया।
जब कामराज, पेरियार और अन्नादुरई अपने नारे व संवाद गढ़कर इतिहास बन चुके थे, ऐसे समय उनकी पटरी बहुत दिन तक करुणानिधि के साथ भी नहीं बैठी। उनसे अलग होकर जिस अन्ना द्रमुक मुनैत्र कड़गम को उन्होंने अपना राजनीतिक मंच बनाया, वह तमिल लोगों को इस तरह प्रभावित कर गया जैसे उनकी फिल्मों का करिश्मा हुआ करता था।
फिल्म हो या राजनीति उन्होंने अपना प्रबल प्रतिद्धंद्वी नहीं उभरने दिया। बेशक शिवाजी गणेशन, एम आर राधा, करुणानिधि चर्चित रहे हों, लेकिन सही मायनों में नायक तो एमजी रामचंद्नन ही थे। तमिलनाडु में जहां पचास के दशक में व्यक्ति पूजा के खिलाफ बड़ा आंदोलन चला, वहीं एमजेआर एक ऐसी शख्सियत के रूप में उभरे, जो उनके प्रंशसकों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं थी। उन्हें गरीबों का मसीहा कहा गया।
तमिल फिल्मों के नायक
एमजीआर का जन्म 1912 में श्रीलंका में हुआ था। पिता एमजी मेनन का साया बचपन में ही उठ गया था। मां सत्यभामा और भाई चक्रपाणी तमिलनाडु के कुंबकोनम में आकर बस गए। हालांकि यह परिवार मूल रूप से केरल का था, लेकिन वह जीविका के लिए तमिलनाडु में ही बसे। यह परिवार गरीबी में जी रहा था। परिवार चलाने के लिए एमजीआर और उनके भाई को यही सूझा कि किसी तरह थियेटर से जुड़कर परिवार का भरण-पोषण किया जाए। सात साल की उम्र में ही वह मदुरई ओरिजनल ब्लू कंपनी से जुड़कर थियेटर की दुनिया में रम गए। यह उनके घर चलाने का एक जरिया बन गया।
थियेटर की दुनिया उन्हें बाहर भी ले गई। करीब दस वर्ष तक वह थियेटर से जुड़े रहे। स्कूल- कालेज के दिनों में किए थियेटर की दुनिया उन्हें फिल्मों की ओर लाई। 1936 में सती लीलावती में वह पहली बार पर्दे पर थे। एमजीआर फिल्म में सहयोगी भूमिका में थे। इसके बाद उन्होंने कुछ और फिल्में की। राजकुमारी की सफलता ने उन्हें नायक बनाया। चालीस के दशक में शालीवाहनम, श्री मुरुगन, राजकुमारी, मोहिनी जैसी फिल्में उन्हें मिलीं। लेकिन 1950 में मंथिरि कुमारी और अली बाबावुम 40 थिरुडारगलुम, नाडोडी मन्नन, अनवेबा जैसी फिल्मों ने बाक्स आफिस में अच्छी कमाई की। उलगाम सुतरुम वालीवन जैसी फिल्म को अपार चर्चा मिली। तमिल फिल्म में जयललिता और एमजीआर की फिल्म ग्लैमर और कला का पर्याय बनी।
नम नाडू, कुडीयरंथा कोविल, पुधिया भूमि, आदिमाईपेन्न, आसाई युगम, कलवकारन चंद्रोध्याम, ओली विलक्कू फिल्में दर्शकों को भा गई। कहा जा सकता है कि अन्ना दुरई ने तमिल जनता तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए फिल्मों का बेहतर उपयोग किया। नाडोडी मन्नन को उनके संदेश का वाहक भी कहा जाता है। इस फिल्म को देखने के लिए सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से भी अपील की गई। उनकी फिल्म नीति निर्देशक के रूप में भी रही। एमजीआर की फिल्मों की अपनी लोकप्रियता, राजनीति में काम आई। फिल्मों में उनकी लगभग तीन दशक की यात्रा है। हालांकि सामाजिक क्षेत्रों में उनकी सक्रियता पहले से बनी हुई थी। गांधीजी की आजादी की लड़ाई से प्रभावित होकर वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से भी जुड़े।
तमिल राजनीति में बनाई पैठ
कांग्रेस की साया एमजीआर को अपने साथ ज्यादा दिन नहीं रख पाई। अन्नादुरई से प्रभावित होकर वह 1952 में डीएमके की उस धारा से जुड़ गए जो तमिल द्रविड़ का शंखनाद कर रही थी। एमजीआर शुरू में हिंदुवादी थे। लेकिन राजनीति की शुरुआत उन्होंने उस डीएमके के साथ की जिसे तर्कवादी पार्टी मानी जाती थी। ऐसा दल जो तमिल अस्मिता के लिए खड़ा हुआ। जहां शुरु में सीधे उत्तर भारत या उच्च जातियों के विरोधी स्वर भी उठते थे। हालांकि एमजीआर ने अपनी लाइन को कभी उग्र नहीं होने दिया। फिल्मों की अपनी लोकप्रियता को जब वह राजनीतिक मंच पर लाए तो उन्हें वंचितों के लिए कहते सुना गया।
वह सामाजिक सुधार और गरीबी को दूर करने जैसी बातों पर लोगों का मन छूते रहे। उन्होंने तमिल गौरव की बात तो की, लेकिन इसके लिए वह अपने स्तर पर ही उठने की बात कहते रहे। उनका धार्मिक झुकाव तब भी दिखता रहा, जब आईएडीएमके की सरकार बनी। वह जिस शैली में अपना काम करते रहे उससे अन्नादुरई बहुत प्रभावित रहे। खासकर अन्नादुरई अपने भाषणों में उनकी जमकर प्रशंसा किया करते थे। 1954 में जब शिवाजी गणेशन ने डीएमके के प्रचारक पद से और पार्टी से इस्तीफा दिया, तो जिम्मेदारी एमजीआर को ही सौंपी गई। उन्होंने इन जिम्मेदारियों को उन्होंने बखूबी निभाया।
इस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने 1967 और 1971 में विधानसभा में भी उन्होंने प्रतिनिधित्व किया। अन्नादुरई के निधन के बाद डीएमके में करुणानिधि और वीआर नेदुनसेझियान के बीच पार्टी संघर्ष में एमजीआर ने करुणानिधि का साथ दिया। उन्हें पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब करुणानिधि उनको पार्टी में उनके स्तर के मुताबिक कम तवज्जो देने लगे। यह माना जाने लगा कि करुणानिधि अपने बेटे मुका मूदू को आगे ला रहे हैं। एमजीआर और उनके साथियों को अपनी उपेक्षा का आभास होने लगा। इस विरोध को एमजीआर का पार्टी विरोध माना गया। उधर अन्ना दुरई की याद में आयोजित एक सभा में एमजीआर ने सीधे-सीधे पार्टी पर भ्रष्टाचार और अनियमितता होने का आरोप लगाया। साथ ही पार्टी के बड़े नेताओं और मंत्रियों को अपनी संपत्ति का खुलासा करने की नसीहत भी दी। इसे पार्टी के खिलाफ माना गया। आखिरकार पहले की तय योजना के तहत एमजीरामचंद्रन को पार्टी से निकाल दिया गया।
किया नई पार्टी का गठन
एमजी रामचंद्रन ने आखिरकार 1972 को आल इंडिया अन्ना द्रमुक पार्टी का गठन किया। कहा जाता है कि उस समय क्षेत्रीय दलों की मान्यता खत्म करने पर विचार हो रहा था। इसीलिए एमजीआर ने अपने दल को राष्ट्रीय नाम दिया। उन्होंने झंडे में भी ज्यादा परिवर्तन नहीं किया। केवल बीच मे अन्नादुरई की एक तस्वीर लगा दी। आल इंडिया द्रमुक पार्टी का गठन करने के बाद उन्होंने पार्टी के प्रचार का एक सघन अभियान चलाया।
आखिरकार 1977 में वह अपनी पार्टी को चुनाव जिताकर लाए। वह पहले अभिनेता थे जो किसी राज्य में मुख्यमंत्री बने। अमेरिका में एक बड़े सितारे रोनाल्ड रीगन की उपलब्धि को अभी दुनिया के सामने आना था। लेकिन तमिलनाडु में फिल्म का एक सितारा राजनीति के पटल पर भी ऊंचाई छू गया था। यही नहीं उस समय उनकी पार्टी से सांसद कैबिनेट मंत्री भी बने। 1980 में इंदिरा गांधी के जरिए उनकी सरकार को बर्खास्त करने का फैसला भी जनता को रास नहीं आया। जब फिर चुनाव हुए तो एमजी रामचंद्रन को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। 1984 का राजनीतिक पटल और था। इस बार कांग्रेस ने यहां आल इंडिया अन्ना द्रमुक के साथ समझौता किया था। एमजीआर फिर तीसरी बार चुनाव जीत कर आए। अंतिम फिल्म उलेगम सुथी पारु के साथ ही उन्होंने चित्रपट की दुनिया से विदाई ले ली।
लेकिन उनकी तबियत भी बिगड़ती रही। अब वह अपनी पार्टी का ठीक से प्रचार भी नहीं कर पा रहे थे। एक समय उन्होंने आल इंडिया द्रमुक पार्टी की सफलता के लिए लोगों से प्रार्थना करने की अपील भी की। लेकिन लोगों में और पार्टी में उनकी लोकप्रियता इस कदर थी कि जब एक बार उन्होंने इस्तीफा देने का मन बनाया तो सारे मंत्रियों ने उन्हें अपने इस्तीफे सौंप दिए थे। उनकी लोकप्रियता ही थी कि उनकी तबियत खराब होने और उन्हें अस्पताल ले जाने की बात सुनकर हजारों लोग अस्पताल के बाहर जमा हो गए। उनके दस प्रशंसकों ने आत्मदाह किया और कइयों ने आत्मदाह करने की कोशिश की। 1987 में एमजीआर का देहांत हुआ। उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच हुए सत्ता संघर्ष और पार्टी पर अधिकार की लड़ाई में आखिर जयललिता कामयाब हुई। जानकी रामचंद्रन ने स्वयं कुछ समय बाद अपनी पार्टी को आल इंडिया अन्ना द्रमुक में विलीन कर दिया। इसके बाद वह गुमनामी में ही रहीं।
एमजी रामचंद्रन और जयललिता
तमिल फिल्म और राजनीति में एमजी रामचंद्रन और जयललिता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे। हालांकि बाद में जयललिता ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्हें राजनीति में लाने वाले एमजीआर नहीं है। लेकिन जिस तरह की परिस्थितियां बनी उसमें यही कहा जा सकता है कि जयललिता के लिए एमजीआर ने ही राजनीति में रास्ता बनाया। तमिल फिल्म की इस बेहद चर्चित अभिनेत्री को पहले राज्यसभा में भेजा गया। जयललिता को पार्टी के महत्वपूर्ण पद भी दिए गए।
रामचंद्रन के निधन के बाद वह कुछ समय के लिए परिदृश्य से अलग हो गई थीं, लेकिन जब जानकी रामचंद्रन ने पार्टी पर अपना अधिकार जमाया तो जयललिता सामने आ गई और फिर चुनाव में जीत हासिल की।
जब बदल गई एमजीआर की आवाज
तमिल फिल्म के विलेन एम आर राधा ने एमजीआर पर सचमुच गोली चला दी थी। एमजीआर और एम आर राधा ने करीब पच्चीस फिल्में साथ कीं। कुछ लोग कहते हैं कि किसी विवाद के बाद राधा ने एमजीआर के कान के पास गोली चलाई। कुछ लोग कहते हैं कि फिल्म में अभिनय के समय ही राधा ने सचमुच गोली चलाई। एमजीआर को अस्पताल में ले जाया गया। गोली उनके कान पर लगी थी। आपरेशन के बाद एमजीआर स्वस्थ तो हो गए। लेकिन उनकी आवाज बदल चुकी थी। बाद में वह हल्की सी लरजती आवाज बनी रही।
एमजीआर का योगदान
एमजीआर तमिल लोगों के बीच अपनी मसीहाई छवि को लेकर हमेशा सजग रहे। उन्हें राज्य में सामाजिक विकास और शिक्षा उत्थान के लिए याद किया जाता है। खासकर स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए न्यूट्रीशियन मील स्कीम बहुत लोकप्रिय हुई। इससे राज्य के करीब एक लाख बीस हजार बच्चों को फायदा हुआ। एमजीआर ने धार्मिक स्थलों और राष्ट्रीय स्मारकों के सामने शराब पीने और बेचने पर पाबंदी लगाई।
वह फिल्मी दुनिया से आए थे, इसे भूले नहीं। फिल्म तकनीशियन के बच्चों के लिए फ्री स्कूल खुलवाए। सामाजिक आंदोलन में उनकी सहभागिता मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बनी रही। हालांकि उनके राजकाज की आलोचना इस आधार पर भी होती है कि तमिल में लोकलुभावन नीतियों के बीच वह आर्थिक विकास का रथ तेजी से नहीं दौड़ा पाए। विकास चक्र शिथिल रहा।
यह भी कहा जाता है कि औद्योगीकरण के लिए जो नींव के कामराज जैसे नेताओं के समय पड़ गई थी उसे आगे दिशा नहीं दे सके। गुंडा एक्ट 1972 में भी पुलिस के दुरुपयोग की बात सामने आती है। फिर भी तमिल राजनीति में उनकी एक अहम भूमिका है। यह चतुर नेता थे। देखा जाए तो वह करुणानिधि पर भारी पड़ते रहे। उनके किए प्रयासों को बहुत आदर मिलता है। कहा जाता है कि पार्टी के नेताओं ने जरूर अपने पद का कहीं दुरुप्रयोग किया होगा, लेकिन जहां तक एमजीआर की बात है उनकी छवि साफ सुथरी रही। आज भी उनकी तस्वीर पर आल इंडिया अन्ना द्रमुक पार्टी लोगों से वोट मांगती है। एआईडीएमके आज तमिल राजनीति में महत्वपूर्ण धूरी है।
भारत रत्न पर विवाद
एमजीआर को उनकी सेवाओं के लिए 1988 में भारत रत्न दिया गया। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। यह माना जाता है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु में जयललिता सरकार को प्रभाव में लाने के लिए एमजी रामचंद्रन को भारत रत्न गया। इस फैसले को ताबड़तोड़ अमल में लाया गया।
कांग्रेस उस समय जयललिता से गठबंधन करना चाहती थी। यह विवाद अपनी जगह हो सकता है। लेकिन किसी एक राज्य की क्षेत्रीय फिल्म में कला को ऊंचाइयों पर ले जाने और फिर राजनीति में आकर समाज कल्याण के लिए किए गए कामों के लिए उनके प्रशंसक इसे समय पर लिया गया उचित फैसला बताते हैं।
करुणानिधि ने यह बात कही है कि एमजी रामचंद्रन आखिरी वर्षों में अपनी पार्टी का अन्ना द्रमुक के साथ विलय करना चाहते थे। बीजू पटनायक के जरिए मध्यस्थता की जा रही थी। लेकिन बात बन नहीं पाई। रामचंद्नन अब नहीं हैं। जयललिता और करुणानिधि की पार्टी तमिल राजनीति में अब दो छोर हैं। उधर जिस अन्ना द्रमुक को त्याग कर एमजीआर ने अपनी लड़ाई लड़ी थी और सत्ता के शीर्ष में पहुंच कर दस वर्ष तक शासन करते रहे, उस द्रमुक में और विभाजन की लकीर नजर आ रही है।