सुनील ने बांग्ला साहित्य को दिया नया मुकाम

कोलकाता/एजेंसी Updated Tue, 23 Oct 2012 11:29 PM IST
Sunil Gangopadhyay given Bengali literature the new stage
प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय का कोलकाता में निधन हो गया। वह 78 वर्ष के थे। पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे गंगोपाध्याय ने मंगलवार तड़के नींद में ही अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार बॉस्टन में रहने वाले उनके पुत्र शॉविक के आने के बाद बुधवार को किया जाएगा। उनका जन्म 7 सितंबर 1934 को वर्तमान बांग्लादेश के फरीदपुर जिले में हुआ था।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सुनील गंगोपाध्याय के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा, ‘अपने विशेष स्टाइल से उन्होंने बांग्ला साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। सुनील गंगोपाध्याय बांग्ला के महान बुद्धिजीवियों में से एक थे। उनके निधन से बांग्ला साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है।’ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन ने भी उनके निधन पर शोक जताया।

गंगोपाध्याय बांग्ला भाषा के प्रतिष्ठित कवि और उपन्यासकार थे। उन्होंने करीब दो सौ पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से अधिकतर कहानियां, उपन्यास, नाटक, आलोचना, यात्रा वृत्तांत के अलावा बाल साहित्य शामिल हैं। वर्ष 1985 में सुनील गंगोपाध्याय को उनके उपन्यास ‘सेई समय’ के लिए  साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लंबे समय तक साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष रहने के बाद उन्हें साल 2008 में साहित्य अकादमी का अध्यक्ष चुना गया था।

उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में ‘पार्थो आलो’ और ‘पूर्बो-पश्चिम’ शामिल हैं। उनके उपन्यास ‘प्रतिद्वंद्वी’ पर महान फिल्मकार सत्यजीत रे फिल्म भी बना चुके हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें आनंद पुरस्कार (1989), बंकिम पुरस्कार (1983) और द हिंदू साहित्य पुरस्कार (2011) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

लोकप्रिय काल्पनिक किरदार ‘नीरा’
सुनील गंगोपाध्याय अक्सर नील लोहित, नील उपाध्याय और सनातन पाठक के नाम से लिखते थे। उनका पसंदीदा काल्पनिक किरदार ‘नीरा’ था। उनकी रचनाओं में यह नाम अक्सर देखने को मिलता था। आनंद बाजार पत्रिका में एक पत्रकार के रूप में लिखने के अलावा वह युवा बंगाली कवियों को भी आगे बढ़ाने का काम करते थे। इसके लिए उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘कृतिवास’ नाम की मैगजीन की भी शुरुआत की, जिसमें युवा बंगाली कवियों की रचनाओं को जगह दी गई।

कोट

‘सुनील गंगोपाध्याय बांग्ला के महान बुद्धिजीवियों में से एक थे। उनके निधन से बांग्ला साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है।’ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

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