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महिलाओं के हाथों में थमाया क्रेडिट कार्ड, बदल दी जिंदगी
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 16 Dec 2015 02:53 PM IST
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खुद पर भरोसा हो जाए, तो पहले खुद की जिंदगी बदलती है, फिर घर और फिर पूरा समाज। शारदा सिंह ने अपने इलाके की सैकड़ों महिलाओं को भरोसे का क्रेडिट कार्ड थमाकर परिवर्तन की एक लहर चला दी है।
बेटियों को पढ़ा-लिखाकर क्या कलेक्टर बनाना है?’ यह वाक्य शारदा सिंह के कानों में आज भी गूंजता रहता है। शारदा की पढ़ाई को लेकर गांव के लोग उनके पिता को ताने मारते थे। तभी बुलंदशहर में जन्मीं शारदा सिंह को महसूस हुआ था कि घर में सोलह से अठारह घंटे काम करने वाली महिलाएं इतना लाचार इसलिए हैं कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं।
शारदा के मन में एक विचार आया कि क्यों न महिलाओं को आर्थिक स्तर पर जागरूक किया जाए। शादी के बाद जब वह गाजियाबाद आईं, तो यहां कमोबेश यही स्थिति थी। यहीं से उनके सपनों को बल मिला और वो निकल पड़ीं अपनी मंजिल कि ओर।
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2007 में ‘शांति शिक्षा एवं नारी उत्थान समिति’ की नींव रख, महिलाओं को जागरूक करने का काम शुरु किया और आज वह लगभग आज छह हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। लगभग 2,600 महिलाओं को उनकी पसंद के कामों का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार शुरू करा चुकी हैं।
उनका स्वयं सहायता समूह अभियान गजब का है। उनकी प्रेरणा से दस से पंद्रह महिलाएं अपना समूह बनाती हैं और बचत कर पैसे जुटाती हैं। इस पैसे से वह कोई छोटा उद्योग स्थापित करती हैं।
हुनरमंद महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, अचार, कंप्यूटर ट्रेनिंग, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग, टॉय मेकिंग आदि का निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जाता है। महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों को बड़े मेलों में स्टॉल लगाकर बेचा जाता है और मुनाफे को उत्पाद बनाने वाली महिलाओं को दिया जाता है। शारदा कहती हैं,`महिलाएं अपनी मदद तो खुद करती हैं, मैं सिर्फ उन्हें भरोसे का क्रेडिट कार्ड थमाती हूं।’
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बेटियों को पढ़ा-लिखाकर क्या कलेक्टर बनाना है?’ यह वाक्य शारदा सिंह के कानों में आज भी गूंजता रहता है। शारदा की पढ़ाई को लेकर गांव के लोग उनके पिता को ताने मारते थे। तभी बुलंदशहर में जन्मीं शारदा सिंह को महसूस हुआ था कि घर में सोलह से अठारह घंटे काम करने वाली महिलाएं इतना लाचार इसलिए हैं कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं।
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शारदा के मन में एक विचार आया कि क्यों न महिलाओं को आर्थिक स्तर पर जागरूक किया जाए। शादी के बाद जब वह गाजियाबाद आईं, तो यहां कमोबेश यही स्थिति थी। यहीं से उनके सपनों को बल मिला और वो निकल पड़ीं अपनी मंजिल कि ओर।
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2007 में ‘शांति शिक्षा एवं नारी उत्थान समिति’ की नींव रख, महिलाओं को जागरूक करने का काम शुरु किया और आज वह लगभग आज छह हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। लगभग 2,600 महिलाओं को उनकी पसंद के कामों का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार शुरू करा चुकी हैं।
उनका स्वयं सहायता समूह अभियान गजब का है। उनकी प्रेरणा से दस से पंद्रह महिलाएं अपना समूह बनाती हैं और बचत कर पैसे जुटाती हैं। इस पैसे से वह कोई छोटा उद्योग स्थापित करती हैं।
हुनरमंद महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, अचार, कंप्यूटर ट्रेनिंग, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग, टॉय मेकिंग आदि का निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जाता है। महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों को बड़े मेलों में स्टॉल लगाकर बेचा जाता है और मुनाफे को उत्पाद बनाने वाली महिलाओं को दिया जाता है। शारदा कहती हैं,`महिलाएं अपनी मदद तो खुद करती हैं, मैं सिर्फ उन्हें भरोसे का क्रेडिट कार्ड थमाती हूं।’