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अपनी ही नहीं दूसरों की भी जिंदगी बदलने की कोशिश

Wed, 16 Dec 2015 01:20 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 16 Dec 2015 01:20 PM IST
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success story of seema fatima sahid

मेरठ के एक किसान परिवार की फातिमा ने शिक्षा के जो बीज बोए हैं, उनसे दूसरों के हिस्से में रोशनी आई है और फातिमा की मुट्ठी में ढेर सारी खुशबू।

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उम्र कम थी। क्लास भी छोटी, लेकिन खुद से कही गई वह बात बहुत बड़ी थी। इतनी बड़ी कि न सिर्फ मेरठ के किसान परिवार से जुड़ी फातिमा शाहिद की जिंदगी बदल गई, बल्कि और भी कई घर बदले, जिंदगियां बदलीं। स्कूल के वक्त अपनी हमउम्र सहेलियों को यूं ही इधर-उधर भटकते देख फातिमा को समझ में नहीं आता था कि उनको स्कूल न जाने के लिए बहानों की जरूरत क्यों नहीं पड़ती।
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मम्मी-पापा उन्हें डांटते क्यों नहीं? कुछ ही दिनों में सारा माजरा समझ में आ गया। तब एक दिन स्कूल जाते वक्त फातिमा ने खुद से कहा था-`जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो इन लोगों को बताऊंगी कि स्कूल जाना क्यों जरूरी है।’ कई बरस बीत गए, फिर भी खुद से किया हुआ अपना वादा फातिमा को याद है।
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मेरठ के छोटे से गांव जानीकलां की रहने वाली फातिमा शाहिद खुद तो पढ़ ही रही हैं, साथ ही बच्चों को भी शिक्षित  कर रही हैं।  बच्चों को स्कूल न भेजने वाले अभिभावकों को शिक्षा का महत्व भी समझा रही हैं। अपनी कोशिश से फातिमा 2006 से अब तक वह 50 बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा चुकी हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को फातिमा अपने परिवार की मदद से पाठ्य सामग्री उपलब्ध करा रही हैं।


यही नहीं, बीए में पढ़ने वाली फातिमा अपने घर पर भी बच्चों को पढ़ाती हैं। इसके लिए वे बच्चों से कुछ फीस नहीं लेती हैं। यहां तक कि इन बच्चों लिए पाठ्य-सामग्री की व्यवस्था भी फातिमा खुद के खर्चे पर ही करती हैं। `बचपन बचाओ’ आंदोलन की मुहिम शुरू करने वाले कैलाश सत्यार्थी भी फातिमा से मिलकर उनके काम की प्रशंसा कर चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भी फातिमा को उनके कार्य के लिए सम्मानित कर चुका है। वैसे देखें तो फातिमा का परिवार खेती से जुड़ा है, लेकिन फातिमा शिक्षा के बीज बोने में लगी हैं। कहती हैं,`किसी को अक्षरदान देकर लगता है, मानो अपनी मुट्ठी में खुशबू भर आई हो।’




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