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हुनर तो था बस उसे मुकाम देने का काम किया

Wed, 16 Dec 2015 02:54 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 16 Dec 2015 02:54 PM IST
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success story of sabnam khan

हुनर को हेल्पलाइन मिल जाए तो लाइफलाइन बड़ी हो ही जाती है। घर-आंगन में उम्मीदों की धूप उतर आती है। उत्तर प्रदेश के रामपुर में उम्मीदों की इस धूप से इंद्रधनुष सजाने का काम कर रही हैं शबनम।

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हाथ में हुनर हो, तो बस उसे तराशने भर की जरूरत होती है, जिंदगी को रास्ता मिल जाता है। लेकिन, तराशे कौन? कौन रास्ता दिखाए? ऐसे सवालों से रामपुर में न जाने कितनी महिलाएं जूझ रही थीं। तभी शबनम खान को लगा कि कुछ करना चाहिए।  मुरादाबाद में जन्मीं शबनम को बचपन से ही दूसरों की मदद करना अच्छा लगता था।
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शादी होने के बाद जब वह रामपुर अपने ससुराल पहुंचीं, तो ससुराल वालों ने दूसरों की मदद करने से उन्हें रोका नहीं, बल्कि प्रोत्साहित करना शुरू किया। ससुराल वालों का साथ पाकर शबनम ने `समाज सेवा जन-कल्याण समिति’ नाम की एक संस्था बनाई।
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इस संस्था ने रामपुर में जरी आदि का काम करने वाले दस हजार से ज्यादा हस्तशिल्प कारीगरों के लिए हस्तशिल्प कार्यालय बरेली से पहचान पत्र जारी कराया, जिनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा है। शबनम इन कारीगरों को बैंकों से लोन दिलाकर अपना व्यवसाय शुरू कराने का भी काम कर रही हैं। 19 साल से समाज सेवा में लगी शबनम ने 2005 से बालश्रम के खिलाफ  एक अभियान छेड़ रखा है।

बाल श्रमिकों के लिए रामपुर में चार स्कूल खोलकर, शबनम उन्हें निःशुल्क शिक्षा और साथ में स्वरोजगार का प्रशिक्षण भी दे रही हैं, जैसे पतंग, टेडीबियर बनाना, सिलाई-कढ़ाई, फ्लावर मेकिंग आदि का काम। मुरादाबाद, रामपुर, टांडा, बरेली आदि क्षेत्र की दस हजार महिलाएं शबनम के साथ जुड़ी हैं। शबनम इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, स्वयं-सहायता समूह बनाकर बचत करने, स्वरोजगार के लिए बैंकों से लोन दिलाने और वेश्यावृति में फंसी युवतियों को मुक्ति दिलाने की मुहिम चला रही हैं।


 शबनम बेशक मुस्लिम परिवार से हैं, लेकिन वह अपने काम न जाति देखती हैं और न ही धर्म। हुनरमंद हाथों को पहचान दिलाने वाली शबनम आज रामपुर की एक सशक्त पहचान बन चुकी हैं। शबनम ने पीड़ित महिलाओं के लिए एक हेल्पलाइन भी शुरू की, जिस पर फोन करने वालों को मदद भी मिलती है, परामर्श

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