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अपना घर छोड़ बेटियों को बढ़ाकर दे रही हैं मिसाल
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Tue, 15 Dec 2015 09:11 PM IST
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समाज में बेटियों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दुर्व्यवहार ने रश्मि आर्या को ऐसा झकझोरा कि 14 साल की उम्र में अपना घर बार छोड़कर बेटियों को साक्षर बनाने का जिम्मा उठा लिया।
मूलरूप से छत्तीसगढ़ की रहने वाले रश्मि के जीवन का बस एक ही लक्ष्य है, बेटियों के जीवन को संवारना और नई ऊंचाइया देना। संस्कृत और समाजशास्त्र से एमए और बीएड रश्मि ने अपनी मुहिम के लिए स्कूल की सरकारी नौकरी छोड़ दी।
इतना ही नहीं बेटियों के लिए उन्होंने आजीवन शादी न करने की शपथ भी ले ली। बेसहारा बेटियों की शिक्षा के लिए 2005 में परीक्षतगढ़ ब्लॉक के नारंगपुर गांव में रश्मि ने एक श्रीमद् दयानंद कन्या गुरुकल बनाया। शुरुआत में पांच बेटियों के साथ पढ़ाई शुरू की गई।
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आसपास के लोगों के दान से गुरुकुल की जरूरतें पूरी होती थीं। इस बीच कई बार हिम्मत टूटी, समस्याओं का सामना हुआ, लेकिन हार नहीं मानी। मेहनत और लगन से गुरुकुल चल पड़ा। इस गुरुकुल में बेटियों को शिक्षा के साथ-साथ वैदिक शिक्षा भी दी जाती है। इस गुरुकुल का उदृदेश्य छात्राओं का सर्वांगीण विकास करना है।
बेटियां सशक्त बनें इसलिए गुरुकुल में उन्हें मार्शल आर्ट, योग, जूड़ो, कराटे और निशानेबाजी के साथ-साथ विभिन्न खेलों की तैयारी कराई जाती है। खासबात यह है कि गुरुकुल से जुड़े सभी काम रश्मि खुद करती हैं। गुरुकुल में पढ़ने वाली बेटियां आज अच्छी नौकरी पर हैं।
यही वजह है कि यहां 14 कमरे के इस गुरुकुल में असम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम आदि राज्यों की 65 बेटियां नर्सरी से 12वीं तक की अवासीय शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। इन बेटियों की उंगलियां जब कंप्यूटर के कीबोर्ड पर थिरकती हैं और उनके सुर हवा में मिठास घोलते हैं तो रश्मि का खुद पर फक्र का अहसास होता है।
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मूलरूप से छत्तीसगढ़ की रहने वाले रश्मि के जीवन का बस एक ही लक्ष्य है, बेटियों के जीवन को संवारना और नई ऊंचाइया देना। संस्कृत और समाजशास्त्र से एमए और बीएड रश्मि ने अपनी मुहिम के लिए स्कूल की सरकारी नौकरी छोड़ दी।
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इतना ही नहीं बेटियों के लिए उन्होंने आजीवन शादी न करने की शपथ भी ले ली। बेसहारा बेटियों की शिक्षा के लिए 2005 में परीक्षतगढ़ ब्लॉक के नारंगपुर गांव में रश्मि ने एक श्रीमद् दयानंद कन्या गुरुकल बनाया। शुरुआत में पांच बेटियों के साथ पढ़ाई शुरू की गई।
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आसपास के लोगों के दान से गुरुकुल की जरूरतें पूरी होती थीं। इस बीच कई बार हिम्मत टूटी, समस्याओं का सामना हुआ, लेकिन हार नहीं मानी। मेहनत और लगन से गुरुकुल चल पड़ा। इस गुरुकुल में बेटियों को शिक्षा के साथ-साथ वैदिक शिक्षा भी दी जाती है। इस गुरुकुल का उदृदेश्य छात्राओं का सर्वांगीण विकास करना है।
बेटियां सशक्त बनें इसलिए गुरुकुल में उन्हें मार्शल आर्ट, योग, जूड़ो, कराटे और निशानेबाजी के साथ-साथ विभिन्न खेलों की तैयारी कराई जाती है। खासबात यह है कि गुरुकुल से जुड़े सभी काम रश्मि खुद करती हैं। गुरुकुल में पढ़ने वाली बेटियां आज अच्छी नौकरी पर हैं।
यही वजह है कि यहां 14 कमरे के इस गुरुकुल में असम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम आदि राज्यों की 65 बेटियां नर्सरी से 12वीं तक की अवासीय शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। इन बेटियों की उंगलियां जब कंप्यूटर के कीबोर्ड पर थिरकती हैं और उनके सुर हवा में मिठास घोलते हैं तो रश्मि का खुद पर फक्र का अहसास होता है।