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विश्वास था निशाने पर और लगा भी निशाना
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Wed, 16 Dec 2015 03:13 PM IST
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शूटिंग रायफल किराये की जरूर थी, हौसला नहीं। नवावाद झांसी की महिला थानाध्यक्ष रंजना गुप्ता ने एक निशाना लगाया, पूरे उत्तर प्रदेश ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया।
कानपुर में पली-बढ़ी रंजना को बचपन से ही (निशानेबाजी) का शौक था, घरवालों को यह बात पसंद न थी। पिता को भी यह पसंद नहीं था कि रंजना इंटर के बाद कॉलेज की पढ़ाई जारी रखे। रंजना ने अपनी जिद व विश्वास से परिवार को आगे की पढ़ाई के लिए मना लिया। बीएड, एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल तो कर ली, लेकिन अपने पसंदीदा खेल को भूलना पड़ा। परिवार वाले तो निशानेबाजी के एकदम खिलाफ थे।
तभी रंजना की जिंदगी में उम्मीद की एक रोशनी आई। उत्तर प्रदेश पुलिस (2005) में सब इंस्पेक्टर के पद पर चयन हो गया। ट्रेनिंग के दौरान रायफल चलाने की प्रैक्टिस में रंजना हर लक्ष्य को आसानी से भेदती गईं और फिर शुरू हुई निशानेबाजी की प्रैक्टिस। प्रैक्टिस खुद की थी, किसी अनुभवी का साथ नहीं था।
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हां, खुद पर भरोसा जरूर था। वर्ष 2008 में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनका चयन हो गया। अब सामने मुश्किल यह थी कि रंजना के पास अपनी शूटिंग रायफल नहीं थी। हैदराबाद के एक शूटर से किराये की रायफल लेकर उन्होंने `ऑल इंडिया
शूटिंग स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप’ में पहला पदक जीत कर साबित कर दिया कि दिल में जज्बा हो, तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। इसके बाद रंजना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंडो-भूटान इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप, अमेरिका में आयोजित वर्ल्ड पुलिस इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप-2015 में तीन स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पुरस्कार समेत कई और पुरस्कार जीतकर रंजना ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का मान बढ़ाया है, बल्कि प्रदेश का भी नाम रोशन किया है।
इस उपलब्धि के लिए राज्य सरकार ने उन्हें रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। भारत सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। डॉ. रंजना की काबिलियत देखकर लोगों ने 13.50 लाख की रायफल भेंट कर उन्हें देश-प्रदेश का मान बढ़ाने का उपहार दिया है। सच तो यह है कि रंजना की काबिलियत को देखकर लोगों में यह जागरूकता आई है कि बेटियां किसी से कम नहीं। रंजना कहती हैं, `मेरी कहानी सुनने के बाद कई लड़कियां खेल में आ रही हूं। एक बड़ी बहन की तरह मैं उनके साथ हूं।’
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कानपुर में पली-बढ़ी रंजना को बचपन से ही (निशानेबाजी) का शौक था, घरवालों को यह बात पसंद न थी। पिता को भी यह पसंद नहीं था कि रंजना इंटर के बाद कॉलेज की पढ़ाई जारी रखे। रंजना ने अपनी जिद व विश्वास से परिवार को आगे की पढ़ाई के लिए मना लिया। बीएड, एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल तो कर ली, लेकिन अपने पसंदीदा खेल को भूलना पड़ा। परिवार वाले तो निशानेबाजी के एकदम खिलाफ थे।
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तभी रंजना की जिंदगी में उम्मीद की एक रोशनी आई। उत्तर प्रदेश पुलिस (2005) में सब इंस्पेक्टर के पद पर चयन हो गया। ट्रेनिंग के दौरान रायफल चलाने की प्रैक्टिस में रंजना हर लक्ष्य को आसानी से भेदती गईं और फिर शुरू हुई निशानेबाजी की प्रैक्टिस। प्रैक्टिस खुद की थी, किसी अनुभवी का साथ नहीं था।
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हां, खुद पर भरोसा जरूर था। वर्ष 2008 में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनका चयन हो गया। अब सामने मुश्किल यह थी कि रंजना के पास अपनी शूटिंग रायफल नहीं थी। हैदराबाद के एक शूटर से किराये की रायफल लेकर उन्होंने `ऑल इंडिया
शूटिंग स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप’ में पहला पदक जीत कर साबित कर दिया कि दिल में जज्बा हो, तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। इसके बाद रंजना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंडो-भूटान इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप, अमेरिका में आयोजित वर्ल्ड पुलिस इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप-2015 में तीन स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पुरस्कार समेत कई और पुरस्कार जीतकर रंजना ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का मान बढ़ाया है, बल्कि प्रदेश का भी नाम रोशन किया है।
इस उपलब्धि के लिए राज्य सरकार ने उन्हें रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। भारत सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। डॉ. रंजना की काबिलियत देखकर लोगों ने 13.50 लाख की रायफल भेंट कर उन्हें देश-प्रदेश का मान बढ़ाने का उपहार दिया है। सच तो यह है कि रंजना की काबिलियत को देखकर लोगों में यह जागरूकता आई है कि बेटियां किसी से कम नहीं। रंजना कहती हैं, `मेरी कहानी सुनने के बाद कई लड़कियां खेल में आ रही हूं। एक बड़ी बहन की तरह मैं उनके साथ हूं।’