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बनाया अभियान लोगों में बचत की आदत डालना

Wed, 16 Dec 2015 04:15 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 16 Dec 2015 04:15 PM IST
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success story of girija tripathi

देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी के पास कोई बड़ा बैंक बैलेंस तो नहीं था, एक अच्छी आदत की जमा-पूंजी जरूर थी-दूसरों की मदद करना। वह अच्छी आदत अब उनके एक अभियान का हिस्सा है।

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ससुराल से पीड़ित कोई लड़की, घर से निकाली गई कोई बुजुर्ग या कोई असहाय मां की मदद करना, देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी के लिए ये सब जिंदगी का मकसद है। किसी महिला को मुसीबत में देखकर वह ढाल की तरह सामने खड़ी हो जाती हैं और पीड़ित महिलाओं के लिए तब तक मदद की मुहिम चलाती रहती हैं, जब तक उनकी समस्या का समाधान न हो जाए।
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1988 से जारी अपनी मुहिम से गिरिजा अब तक ढेर सारी महिलाओं को आश्रय दे चुकी हैं, कई महिलाओं को रोजगार दिला चुकी हैं। ...और ये सब वह कर पाई हैं अपनी एक अच्छी आदत की बदौलत, जो बचपन से उनकी जमा-पूंजी थी- दूसरों की मदद करना। पिता फौज में थे।
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1971 की लड़ाई के बाद असम में गिरिजा ने कई ऐसी महिलाओं के दर्द को नजदीक से देखा था, जिनके अपने युद्ध में मारे गए थे या युद्ध की आंच उन महिलाओं के परिवार तक पहुंची थी। तभी मन-ही-मन निर्णय लिया कि महिलाओं के लिए कुछ करना है।

एमए (मनोविज्ञान) कर चुकी गिरिजा के लिए यह काम इतना आसान भी न था, लेकिन महिलाओं को जागरूक करने की जो मुहिम गिरिजा ने शुरू की, उसे रुकने नहीं दिया। उनके हौसले से अन्य महिलाएं भी उनके साथ जुड़ती गईं। इसके लिए उन्होंने 1993 में ‘मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण समाज सेवा संस्थान’ की नींव रखी।  आज वह महिला शिक्षा, स्वरोजगार प्रशिक्षण, घर से निकाली गई बुजुर्गों को वापस परिवार में शामिल कराने, भटकी हुई बालिकाओं को आश्रय देने, बालिकाओं की शादी कराने आदि कार्य निस्वार्थ भाव से कर रही हैं।

यही नहीं, असहाय महिलाओं के लिए वे 2002 से अल्पवास गृह चला रही हैं, वहां स्वरोजगार प्रशिक्षण देने के साथ-साथ आश्रय भी दिया जाता है। गिरिजा अपने खर्च पर वह अब तक 45 बेटियों का विवाह करा चुकी हैं।


जेल में बंद असहाय व जरूरतमंद  महिलाओं के लिए भी वह देवरिया जेल में काउंसलिंग का काम कर रही हैं। कई ऐसी महिलाएं, जिन्हें परिवार ने त्याग दिया था या वह विधवा होने के चलते घर से निकाल दी गई थीं, गिरिजा ने उनकी फिर से शादी करवाकर उनका घर बसाया है या फिर परिवार में उन्हें दोबारा शरीक किया है। दूसरों की मदद करने की यह आदत अब भी उनकी जमा-पूंजी है।

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