फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   success story of balmeet kaur

कोशिश ये जो भी पास आए, कुछ बनकर जाए

Wed, 16 Dec 2015 01:09 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 16 Dec 2015 01:09 PM IST
विज्ञापन
success story of balmeet kaur

शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त बच्चों के प्रति संवेदना तो सब रखते हैं, लेकिन बहराइच की डॉ. बलमीत कौर संवेदना से आगे जाकर मूक-बधिर बच्चों के लिए बड़ी बहन की भूमिका में आ जाती हैं। अब बड़ी बहन बन गईं, तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने और नए सिरे से जिंदगी को बसाने का प्रयास तो करना ही पड़ेगा।

विज्ञापन


संसार का हर काम पुरस्कार के लिए तो नहीं होता। 22 साल पहले बलमीत के मन में यह ख्याल तब आया था, जब आसपास के लोग जिंदगी का एक ही मकसद बताते थे, ढेर सारे रुपये, बड़ा-सा ओहदा और राज सम्मान...पुरस्कार और न जाने क्या-क्या? बलमीत भी चाहतीं, तो ये सब पा सकती थीं। अच्छी खासी डिग्री थी। हाथ में रिजल्ट था।
विज्ञापन


बहराइच की इस पीएचडी-होल्डर को बड़ी-सी नौकरी मिल सकती थी, लेकिन बलमीत ने ऐसे बच्चों के लिए काम करना पसंद किया, जो शारीरिक रूप से अक्षम थे। हालांकि, यह ख्याल उनको अपने छोटे भाई गुरविंदर की विकलांगता को देखकर आया। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन बच्चों की तरफ कोई ध्यान दे, तो ये भी समाज के विकास में योगदान दे सकते हैं। इसी सोच के साथ बलमीत ने शुरू किया अपना सफर।
विज्ञापन
विज्ञापन


अपने 22 साल के सफर में आर्थिक और अन्य तरह की परेशानियों ने बलमीत के हौसलों को ध्वस्त करना चाहा, लेकिन बलमीत ने हार नहीं मानी। अपने पिता के बसाए `बाबा सुंदर शिक्षा समिति’ के जरिये बलमीत अब तक सैकड़ों मूक-बधिर, मानसिक और शारीरिक रूप से निशक्त बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं और उनको आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल भी खोला है।


 यही नहीं, वह बच्चों के रहने, खाने, पढ़ने की व्यवस्था भी खुद करती हैं। गरीब और असहाय बच्चों का खर्चा बलमीत खुद उठाती हैं। आय का कोई साधन न होने के बावजूद भी वह पूरी हिम्मत के साथ अशक्त बच्चों के साथ खड़ी हैं। दूसरों के भले के लिए, अपने शरीर के दान की घोषणा कर चुकीं बलमीत की जिंदगी का एक ही मकसद है,`जो मेरे पास आए, कुछ बनकर जाए, कुछ सीखकर जाए।’

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed