92 साल के वागीश के जज्बे को आप भी करेंगे सलाम
92 साल की उम्र में आप क्या कर रहे होंगे, क्या आपने कभी सोचा है? नहीं, तो 92 साल के विद्या वागीश के बारे में जानकर आप भी उन्हें सलाम करेंगे।
कैसे विद्या वागीश शर्मा ने अपनी जमा पूंजी से उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस में गरीब बच्चों के लिए वहां स्कूल खोला, जहां दूर-दूर तक स्कूल का कोई नाम ही नहीं है। चाहते तो विद्या वागीश भी आराम की जिंदगी इलाहाबाद में जी सकते थे।
पर उन्होंने आराम की जिंदगी को ना कह दिया। उत्तर प्रदेश सरकार के आबकारी विभाग में उपआयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए विद्या वागीश शर्मा का हाथरस के उस गांव से उनका लगाव कम नहीं हुआ जिसमें करीब 50 साल पहले वो रहते थे।
अपनी मजबूत आवाज के साथ एक जिंदा आत्मविश्वास लिए विद्या वागीश शर्मा बताते हैं कि करीब आठ साल पहले जब मैं अपने गांव हाथरस के ग्राम सिखरा आया तो मैंने देखा कि यहां के बच्चों को पढ़ने के लिए 12वीं क्लॉस तक कोई स्कूल नहीं था।
दो स्कूल यहां पर पहले खुले पर वो बंद हो गए। यहां पर बच्चों को अपनी आठवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद करीब 7-10 किलोमीटर दूर अपनी आगे की पढ़ाई करने के लिए जाना पड़ता था। इसका सबसे ज्यादा नुकसान लड़कियों को होता था जो आगे पढ़ना चाहती थीं। पर आगे की पढ़ाई के लिए स्कूल इतना दूर होने के चलते उन्हें बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देनी पड़ती थी।
लाखों रुपए की जमा पूंजी स्कूल को बनाने में खर्च कर दी
विद्या वागीश बताते है कि एक समय ऐसा आया जब उनके पास पैसा था, पर उस पैसे का प्रयोग करने वाला कोई नहीं था। ऐसे में उन्होंने गांव के बच्चों की शिक्षा की हालत देखकर था एक स्कूल बनाने का फैसला किया। उन्होंने अपनी लाखों रुपए की जमा पूंजी को इस स्कूल को बनाने में खर्च कर दिया।
आज अपने पिता के नाम से शुरू किए गए टीकाराम स्मारक इंटरमीडिएट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 500 पहुंच गई है। उन बच्चों में भी अधिकतर पढ़ने वाली लड़कियां ही हैं। नर्सरी और प्राइमरी को अंग्रेजी माध्यम से शुरू कर दिया गया है। वहीं 9वीं से 12वीं तक पढ़ने के लिए बच्चों को दूर नहीं जाना पड़ता है। विद्या वागीश ने बताया कि अभी कुल 7 शिक्षक यहां पर बच्चों को पढ़ा रहे हैं। आगे उनकी संख्या और बढ़ाई जाएगी। अभी हमारा ध्यान प्राइमरी और 9 से 12वीं तक की क्लॉस की ओर ही है। आगे आने वाले समय में हम 6-8 क्लॉस तक की पढ़ाई शुरू करवाएंगे।
विद्या वागीश शर्मा अपने घरवालों से दूर इस उम्र में हाथरस के सिखरी गांव में शिक्षा की रोशनी की फैलाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। वो बताते हैं कि गांव के कुछ लोग उनकी मदद करते हैं और अपने घर का बना खाना खिलाते हैं। इतनी उम्र में भी उन्होंने अपने आराम की परवाह नहीं है। किसी दूसरे के घर में एक कमरा बनवाकर वो वहां रह रहे हैं।
'गांव में जाना फायदेमंद नहीं'
विद्या वागीश स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों की तारीफ करते हुए कहते कि बेटियां पढ़ना चाहती हैं और वो पढ़ने में बहुत अच्छी हैं। बेटियां इसलिए खूब मेहनत करती हैं कि कैसे वो अच्छे से अच्छे नंबरों से पास हो सकें। लड़कों को लेकर वो चिंतित दिखते हैं और बताते हैं कि यहां के लड़के मेहनत नहीं करते हैं। इसकी असल वजह वो उनके परिवार के लोगों को मानते हैं। उनका कहना है कि यहां न तो लोग ज्यादा संपन्न हैं और न ही ज्यादा विचारशील। इसलिए वो अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देते हैं। फिर भी हमारी कोशिश है कि यहां पढ़ने वाले बच्चों को सही मार्गदर्शन दिया जाए।
विद्या वागीश 92 साल की उम्र में भी दिल्ली के कई निजी, मिशनरी स्कूलों, कॉरपोरेट घरानों, एजुकेशन ट्रस्ट जो ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा को लेकर काम कर रहे हैं, के संपर्क में हैं और हाथरस के गांव सिखरा में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। इसके लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से दिल्ली में उन सभी संस्थानों से बातचीत की गई। पर सभी ने यह कहकर मना कर दिया कि इतनी दूर गांव में जाना उनके लिए फायदेमंद नहीं है। इसके बावजूद विद्या वागीश शर्मा ने हार नहीं मानी है और गांव के बच्चों को गांव में में ही बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखा है।