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...जब कसाब ने बताया वो कैसे बना आतंकी

नई दिल्ली/एजेंसी/ब्यूरो

Updated Thu, 22 Nov 2012 11:20 AM IST
story of kasab by his mouth
26 नवंबर, 2008, रात करीब 8 बजे का वक्त। हमेशा की तरह मुंबई में खासी चहल पहल थी। आतंकियों के नापाक इरादों से पूरी तरह बेखबर यह शहर अपनी ही तेज चाल से आगे बढ़ रहा था। ...और इसके बाद मुंबई की रफ्तार एकाएक थमने लगी। देश की आर्थिक राजधानी पर सबसे बड़ा आतंकी हमला शुरू हो गया। कैसे दिया गया इतनी बड़ी साजिश को अंजाम। दहशत के इस सफर की कहां से हुई शुरुआत और कैसे देखते ही देखते एक मजदूर बन गया मुंबई हमलों का गुनहगार। नायर अस्पताल में मुंबई पुलिस को दिए बयान में आतंकी मोहम्मद आमिर अजमल कसाब ने खुद बताई अपनी कहानी...
नाम : मोहम्मद आमिर अजमल कसाब
उम्र : 25 साल
पिता का नाम : मोहम्मद आमिर कसाब
पेशा : मजदूर
शिक्षा : चौथी कक्षा
पता : फरीदकोट, तहसील दिपालपुर, पंजाब, पाकिस्तान

पारिवारिक पृष्ठभूमि
सबसे पहले कसाब ने अपने परिवार के बारे में बताना शुरू किया। उसने मां का नाम नूर इलाही और पिता का नाम आमिर बताया। घर की बदहाल आर्थिक हालत कसाब के शब्दों से बयां हो रही थी। वह कह रहा था कि पिता दही बड़े बेचते थे तो वह खुद भी एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करता था। बड़े भाई अफजल और छोटे भाई मुनीर के बारे में पूछे गए तकरीबन हर सवाल का जवाब वह बेझिझक दे रहा था। उसने बताया कि अफजल की पत्नी का नाम साफिया है और उसके दो बच्चे भी हैं। लड़के का नाम आदिल है और लड़की का नाम कसाब को मालूम नहीं था। मुनीर के बारे में कसाब ने बताया कि वह सकूल (स्कूल) जाता है।

शिक्षा और लश्कर से जुड़ाव
कसाब को अपने स्कूल का नाम याद नहीं था। इतना जरूर कहा कि वह एक प्राइमरी स्कूल था। उसने चौथी कक्षा तक उर्दू जबान में पढ़ाई की थी। वर्ष 2000 में स्कूल छोड़ा तो गरीबी ने कसाब को मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया। कुछ समय बाद वह लाहौर स्थित लेन नंबर 54, तोहिदाबाद मोहल्ले के मकान नंबर 12 में रहने लगा। यहां 2005 तक रहा। इस दौरान नौकरी की तलाश में फरीदकोट आना-जाना भी चलता रहा। आतंकी संगठन लश्कर-ए-ताइबा से जुड़ाव के बारे में कसाब ने पहली बार मुंह खोला। कहा कि पिता आमिर ने उसे एक दिन अपनी गरीबी का हवाला देते हुए दफ्तर वालों (जकी उर रहमान, जिसे कसाब चाचा कहता था) से मिलवाया। दफ्तर वालों ने फिर उसे आगे ट्रेनिंग के लिए भेज दिया। उसे यह विश्वास दिलाया गया कि काम में भले ही खतरा है, लेकिन इससे उसके परिवार की इज्जत बढ़ेगी।

जिहाद और आतंक का प्रशिक्षण
लश्कर आतंकी जकी उर रहमान दिपालपुर स्थित एक खुफिया दफ्तर का संचालन कर रहा था। कसाब को आतंक का प्रशिक्षण शुरू होने की महीना, तारीख या वक्त याद नहीं है, लेकिन ट्रेनिंग कैंप में उस वक्त पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो हत्याकांड की बात की जा रही थी। इसका मतलब यह हो सकता है कि उसकी ट्रेनिंग दिसंबर 2007 में शुरू हुई। मनसेरा के बेतल गांव में करीब 25 और युवकों के साथ कसाब को आतंक का प्रशिक्षण दिया गया। आपस में बात करने की सभी को मनाही थी। सिलसिला 3 महीने तक चला। इस ऑपरेशन के इंचार्ज अबू इस्माइल को हमले से करीब एक महीने पहले कसाब से मिलवाया गया। दोनों को कहा गया, ‘यारो आज मौका आ गया तुम्हारी आजमाइश का।’ एक सीडी दिखाई गई, जिसमें टारगेट की जानकारी थी। उन्हें बताया गया था कि किस तरफ से लक्ष्य की ओर बढ़ना है। इस रास्ते में आजाद मैदान भी था। सीएसटी पर मौजूद लोगों को मारने के लिए कहा गया।

जिहाद की नहीं थी जानकारी
भारत में दहशत फैलाने वाले आतंकी कसाब को जिहाद का मतलब नहीं पता था। उससे पूछा गया तो उसने यही जवाब दिया। कहा, मुझे पता नहीं जिहाद क्या होता है। मगर वे (लश्कर) कहते थे कि इसका मतलब जन्नत से है। मैंने बस पैसों के लिए यह सब किया। कितना पैसा मिला, पूछने पर उसने कहा कि मेरे पिता को लाखों के हिसाब से दिया होगा, मुझे बताया नहीं। हालांकि शक भी कसाब के दिमाग में था कि हो सकता है कि उसके पिता को पैसे न मिले हों। शायद इसीलिए उसने कहा कि हो सकता है कि मुझे उन लोगों (लश्कर) ने मोहरा बनाया हो।

वह काला दिन
अजीजाबाद के पास के गांव कासम से लश्कर के दस आतंकी समुद्र मार्ग के जरिए आतंकी साजिश को अंजाम देने के अपने मिशन पर निकल चुके थे। समुद्र का आधा सफर सभी ने पहले एक बोट के जरिए पूरा किया। इसके बाद सभी दो-दो के ग्रुप में बंटकर डिंगियों के सहारे मुंबई के तट पर मच्छीमार कॉलोनी उतरे। कसाब के साथ दूसरा आतंकी इस्माइल था। यहां से दोनों ने सीएसटी के लिए टैक्सी ली। हर आतंकी के पास आठ हैंड ग्रेनेड और एके-47 राइफल थे। आखिरकार 26 नवंबर को रात करीब 8 बजे आतंक का सिलसिला शुरू हो गया। जो अगले तीन दिनों तक बदस्तूर जारी रहा।

जब तक जिंदा रहो, मारते रहो
ट्रेनिंग देने वाले लोगों ने कसाब से कहा कि तुम जन्नत में जाओगे, तब उसने कहा कि मुझे यहां नहीं रहना। कसाब ने बताया कि घटना वाले दिन उसने दो से ढाई मैगजीन खाली कर दी थी। कसाब के अनुसार मुझे कहा गया था कि जब तक जिंदा रहो, लोगों को मारते रहो। ... मगर हम भी इंसान हैं यार। यह कहते-कहते वह फूट-फूटकर रो पड़ा।

पछतावा
मासूम लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद कसाब को अब अपने किए का पछतावा हो रहा था। उसने बताया कि पुलिस द्वारा पकड़े जाने के करीब एक घंटे बाद वह फूट-फूटकर रोया। उसने कहा कि मैंने बहुत गलत किया। एक अन्य बयान में वह बोला, इस काम के लिए अल्लाह मुझे कभी माफ नहीं करेगा।
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