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जब पीएम बेटे की रिपोर्ट लेने स्कूल गए

Sat, 04 Oct 2014 08:58 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 04 Oct 2014 08:58 PM IST
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stories of real life of lal bahadur shastri

लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बनने वाले ऐसे सरल और साधारण व्यक्ति थे जिनके जीवन का आदर्श प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वही रहा।

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भारत में बहुत कम लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने समाज के बेहद साधारण वर्ग से अपना जीवन शुरू कर देश के सबसे पड़े पद को प्राप्त किया।

चाहे रेल दुर्घटना के बाद उनका रेल मंत्री के पद से इस्तीफा हो या 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनका नेतृत्व या फिर उनका दिया 'जय जवान जय किसान' का नारा, लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता के जो प्रतिमान स्थापित किए हैं, उसके बहुत कम उदाहरण मिलते हैं।
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लाल बहादुर शास्त्री की 110वीं वर्षगांठ के अवसर पर रेहान फजल याद कर रहे हैं उनके जीवन से जुड़े़ कुछ नायाब पहलुओं को।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को आर्थिक सहायता प्रदान करवाना था। आर्थिक सहायता पाने वालों में लाल बहादुर शास्त्री भी थे।
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उनको घर का खर्चा चलाने के लिए सोसाइटी की तरफ से 50 रुपए प्रति माह दिए जाते थे। एक बार उन्होंने जेल से अपनी पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा कि क्या उन्हें ये 50 रुपए समय से मिल रहे हैं और क्या ये घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त हैं ?

ललिता शास्त्री ने तुरंत जवाब दिया कि ये राशि उनके लिए काफी है। वो तो सिर्फ 40 रुपये ख़र्च कर रही हैं और हर महीने 10 रुपये बचा रही हैं।

लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि उनके परिवार का गुज़ारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए उनकी आर्थिक सहायता घटाकर 40 रुपए कर दी जाए और बाकी के 10 रुपए किसी और जरूरतमंद को दे दिए जाएं।

13 साल के बेटे के पैर छुए

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शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री बताते हैं, "एक बार रात के भोजन के बाद उनके पिता ने उन्हें बुलाकर कहा कि मैं देख रहा हूँ कि आप अपने से बड़ों के पैर ढंग से नहीं छू रहे हैं। आप के हाथ उनके घुटनों तक जाते हैं और पैरों को नहीं छूते।

अनिल ने अपनी ग़लती नहीं मानी और कहा कि आपने शायद मेरे भाइयों को ऐसा करते हुए देखा होगा।

इस पर शास्त्री जी झुके और अपने 13 साल के बेटे के पैर छूकर बोले कि इस तरह से बड़ों के पैर छुए जाते हैं। उनका ये करना था कि अनिल रोने लगे। वो कहते हैं कि तब का दिन है और आज का दिन, मैं अपने बड़ों के पैर उसी तरह से छूता हूँ जैसे उन्होंने सिखाया था।

एम्स क्रॉसिंग पर गन्ने का रस

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जब लालबहादुर शास्त्री भारत के गृह मंत्री थे, जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर उनके प्रेस सचिव थे। कुलदीप याद करते हैं कि एक बार वो और शास्त्री जी महरोली से एक कार्यक्रम में भाग लेकर लौट रहे थे। एम्स के पास उन दिनों एक रेलवे क्रॉसिंग होती थी जो उस दिन बंद थी।

शास्त्री जी ने देखा कि बगल में गन्ने का रस निकाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक फाटक खुलता है क्यों न गन्ने का रस पिया जाए। इससे पहले कि कुलदीप कुछ कहते वो खुद दुकान पर गए और अपने साथ-साथ कुलदीप, सुरक्षाकर्मी और ड्राइवर के लिए गन्ने के रस का ऑर्डर किया।

दिलचस्प बात ये है कि किसी ने उन्हें पहचाना नहीं, यहां तक कि गन्ने का रस बेचनेवाले ने भी नहीं। अगर उसे थोड़ा बहुत शक हुआ भी होता तो वो ये सोच कर उसे दरकिनार कर देता कि भारत का गृह मंत्री उसकी दुकान पर गन्ने का रस पीने क्यों आएगा।

शास्‍त्री जी ने लोन लेकर कार खरीदी

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शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक उनका अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। एक बार उनके बच्चों ने उलाहना दिया कि अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। अब हमारे पास अपनी कार होनी चाहिए।


उस ज़माने में एक फ़िएट कार 12,000 रुपए में आती थी। उन्होंने अपने एक सचिव से कहा कि जरा देखें कि उनके बैंक खाते में कितने रुपए हैं? उनका बैंक बैलेंस था मात्र 7,000 रुपए। अनिल याद करते हैं कि जब बच्चों को पता चला कि शास्त्री जी के पास कार खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि कार मत खरीदिए।

लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि वो बाकी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटाएंगे। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार खरीदने के लिए 5,000 रुपए का लोन लिया। एक साल बाद लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया।

उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने सरकार की तरफ़ से लोन माफ करने की पेशकश की लेकिन उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने इसे स्वीकार नहीं किया और उनकी मौत के चार साल बाद तक अपनी पेंशन से उस लोन को चुकाया।

जब शास्त्री शर्मसार हुए

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अनिल बताते हैं कि जहां-जहां भी वो पोस्टिंग पर रहे, वो कार उनके साथ गई। ये कार अभी भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है और दूर- दूर से लोग इसे देखने आते हैं।

कुलदीप नैयर कहते हैं कि एक बार रूस में लेनिनग्राद में शास्त्री बोलशोई थियेटर की स्वान लेक बैले प्रस्तुति देखते हुए बहुत असहज हो रहे थे।

मध्यांतर में उनकी बगल में बैठे हुए कुलदीप ने उनसे पूछा कि क्या वो बैले का आनंद ले रहे हैं तो शास्त्री ने बहुत भोलेपन से जवाब दिया कि उन्हें शर्म आ रही है क्योंकि नृत्यांगनाओं की टांगे नंगी हैं और अम्मा बगल में बैठी हुई हैं। वो अपनी पत्नी ललिता को अम्मा कहा करते थे।

बेटे का रिपोर्ट कार्ड खुद लिया

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साल 1964 में जब शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे। उस जमाने में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग नहीं हुआ करती थी। हां अभिभावकों को छात्र का रिपोर्ट कार्ड लेने के लिए जरूर बुलाया जाता था।

शास्त्री ने भी तय किया कि वो अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वो स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि वो कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

अनिल याद करते हैं, ''मेरी कक्षा 11 बी पहले माले पर थी। वो खुद चलकर मेरी कक्षा में गए। मेरे क्लास टीचर रेवेरेंड टाइनन उन्हें वहां देखकर हतप्रभ रह गए और बोले सर आपको रिपोर्ट कार्ड लेने यहां आने की जरूरत नहीं थी। आप किसी को भी भेज देते। शास्त्री का जवाब था, "मैं वही कर रहा हूं जो मैं पिछले कई सालों से करता आया हूं और आगे भी करता रहूंगा।"

रेवेनेंड टाइनन ने कहा, "लेकिन अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं।" शास्त्री जी मुस्कराए और बोले, "ब्रदर टाइनन मैं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला, लेकिन लगता है आप बदल गए हैं।"

'यॉर प्राइम मिनिस्टर इज दाइंग'

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वर्ष 1966 में ताशकंद में भारत-पाकिस्तान समझौते पर दस्तखत करने के बाद शास्त्री बहुत दबाव में थे। पाकिस्तान को हाजी पीर और ठिथवाल वापस कर देने के कारण उनकी भारत में काफी आलोचना हो रही थी।

उन्होंने देर रात अपने घर दिल्ली फोन मिलाया। कुलदीप नैयर बताते हैं, ''जैसे ही फोन उठा, उन्होंने कहा अम्मा को फ़ोन दो। उनकी बड़ी बेटी फोन पर आई और बोलीं अम्मा फ़ोन पर नहीं आएंगी। उन्होंने पूछा क्यों ? जवाब आया इसलिए क्योंकि आपने हाजी पीर और ठिथवाल पाकिस्तान को दे दिया। वो बहुत नाराज हैं। शास्त्री को इससे बहुत धक्का लगा।

कहते हैं इसके बाद वो कमरे का चक्कर लगाते रहे। फिर उन्होंने अपने सचिव वैंकटरमन को फ़ोन कर भारत से आ रही प्रतिक्रियाएं जाननी चाही। वैंकटरमन ने उन्हें बताया कि तब तक दो बयान आए थे, एक अटल बिहारी वाजपेई का था और दूसरा कृष्ण मेनन का और दोनों ने ही उनके इस कदम की आलोचना की थी।''

कुलदीप बताते हैं, ''उस समय भारत-पाकिस्तान समझौते की खुशी में ताशकंद होटल में पार्टी चल रही थी। मैं चूंकि शराब नहीं पीता था इसलिए अपने होटल के कमरे में आ गया और सोने की कोशिश करने लगा क्योंकि अगले दिन तड़के मुझे शास्त्री जी के साथ अफगानिस्तान के लिए रवाना होना था। मैंने सपने में देखा कि शास्त्रीजी का देहांत हो गया। फिर मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। जब बाहर आया तो एक वहां एक रूसी औरत खड़ी थी। बोलीं- यॉर प्राइम मिनिस्टर इज दाइंग।''

कुलदीप कहते हैं, ''मैंने जल्दी-जल्दी अपना कोट पहना और नीचे आ गया। जब मैं शास्त्री जी के डाचा में पहुंचा तो देखा बरामदे में रूसी प्रधानमंत्री कोसिगिन खड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर इशारा किया कि शास्त्री जी नहीं रहे। जब मैं कमरे में पहुंचा तो देखा बहुत बड़ा कमरा था और उस कमरे में एक बहुत बड़ा पलंग था। उसके ऊपर एक बहुत छोटा सा आदमी नुक्ते की तरह सिमटा हुआ निर्जीव पड़ा था। रात ढ़ाई बजे के करीब जनरल अयूब आए। उन्होंने इजहारे-अफसोस किया और कहा, "हियर लाइज अ पर्सन हू कुड हैव ब्रॉट इंडिया एंड पाकिस्तान टुगैदर'' (यहां एक ऐसा आदमी लेटा हुआ है जो भारत और पाकिस्तान को साथ ला सकता था)।

भारत का यह दुर्भाग्य ही रहा कि ताशकंद समझौते के बाद वह इस छोटे क़द के महान पुरुष के नेतृत्व से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो गया। उन्हें 1966 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया और अली सरदार जाफ़री ने उनकी आख़िरी उपलब्धि के सम्मान में एक नज़्म लिखी-

मनाओ जश्ने मोहब्बत कि ख़ून की बू न रही

बरस के खुल गए बारूद के सियाह बादल

बुझी-बुझी सी है जंगों की आख़िरी बिजली

महक रही है गुलाबों से ताशकंद की शाम

ख़ुदा करे कि शबनम यूँ ही बरसती रहे

ज़मीं हमेशा लहू के लिए तरसती रहे।

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