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मुल्क की सेहत से खिलवाड़, 2225 स्वास्थ्य केंद्रों में नहीं हैं डॉक्टर

Sun, 28 Feb 2016 05:14 AM IST
Updated Sun, 28 Feb 2016 05:14 AM IST
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states are exprensing money on medical facilities

भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली के लिए भले ही कम बजट आवंटन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा हो। लेकिन बजट खर्च करने में राज्यों की नाकामी सरकारी अस्पतालों की खस्ता हालत और सुविधाओं की किल्लत के लिए बड़ी वजह बन रही है।

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स्वास्थ्य के क्षेत्र में 2012 में आवंटित बजट का 84 फीसदी तो 2013 तक मात्र 65 फीसदी ही खर्च किया गया। खर्च में कंजूसी का नतीजा यह हुआ कि 2013 से 2014 के बीच बिना डॉक्टरों के ही चल रहे सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 1072 से बढ़कर एकदम दोगुनी 2,225 हो गई।
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यूपी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 3092 विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत है लेकिन सिर्फ 492 ही उपलब्ध हैं। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और बिहार में भी बुरी हालत है।
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उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों की 40 फीसदी कमी, बिहार में हालात खराब

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देश के स्वास्थ्य केंद्रों में 21,252 विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत है। लेकिन केवल 11,463 डॉक्टरों (53 फीसदी) की ही मंजूरी मिल पाई है। सिर्फ कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर ही दो राज्य हैं जहां जरूरत से आधी संख्या में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं। बिहार में 91 फीसदी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी कमी है।

गैर सरकारी संगठन एकाउंटबिलिटी इनीशेटिव की निदेशक यामिनी अय्यर कहती हैं कि बजट को खर्च करने की कम क्षमता की वजह से भी देश में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत बिगड़ रही है।

हिमाचल प्रदेश में 312 विशेषज्ञों की जरूरत है लेकिन सिर्फ आठ ही उपलब्ध हैं। उत्तराखंड में 236 की जगह 49, हरियाणा में 436 की जगह 29, तमिलनाडु में 1540 की जगह एक भी विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है।

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