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युग पुरुष श्री अरविंदोः एक दिव्य योगी

Wed, 05 Dec 2012 10:34 AM IST
चंदन जायसवाल/नई दिल्ली
चंदन जायसवाल/नई दिल्ली Updated Wed, 05 Dec 2012 10:34 AM IST
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Sri Aurobindo: A divine yogi

कलकत्ता में 15 अगस्त 1872 को जन्मे श्री अरविंदो, एक ऐसे युग पुरुष थे, जिनको युगों तक मनुष्य याद रखेगा। उन्होंने कहा था कि उनके जीवन का उद्देश्य धरती पर दिव्य प्रेम का राज्य स्थापित करना है। ऐसा लक्ष्य किस मनुष्य को प्रिय नहीं होगा।

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श्री अरविंदो के पिता केडी जी नास्तिक थे और चाहते थे कि उनका बेटा पाश्च्यात्य संस्कृति में पले बढ़े। इसलिए उन्होंने सात वर्ष की आयु में ही अरबिंदो को इंग्लैंड भेज दिया। अरबिंदो ने इंग्लैंड में सफलता पूर्वक अपनी शिक्षा पूरी की और अपने पिता के कहने पर वहां होने वाली भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा मे हिस्सा लिया लेकिन ये घुड़सवारी परीक्षण में असफल हो गए और 1893 में वापस भारत आ गए।
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यहां आकर उन्होंने भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। उसे पढ़कर उन्हें लगा कि जो आध्यात्मिक ज्ञान का अपार भंडार भारतीय प्राचीन ग्रन्थों, वेदों पुराणों, उपनिषदों, गीता, रामायण तथा महाभारत में मौजूद है, वह कही और नहीं है।
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इसी दौरान इनको क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण एक साल की जेल हो गई। जेल के दौरान ही इन्होंने भगवान कृष्ण की एक अदृश्य शक्ति को अनुभव किया। जेल से रिहा होने के बाद ये पांडेचेरी चले गए जहां इन्होंने अपने जीवन का ज्यादातर समय विभिन्न तरह की साधना के विस्तार में लगाया।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों को भी जाना और उनसे अभिभूत हुए। किंतु उनकी साधना की दिशा मनुष्य चेतना पर केन्द्रित थी, वे मानव चेतना को शारीरिक, मानसिक, स्नायविक से होते हुए चैत्य की श्रेणी तक ले जाना चाहते थे।

उनके जन्मजात संस्कार, विचार, संकल्प, तपस्या व प्रेरणा शक्ति तथा आदर्श के फलस्वरूप उनकी आध्यात्मिक सहयोगी श्री मां की तपस्या से पांडिचेरी में श्री अरविंद आश्रम की स्थापना हुई। इसमें 2000 व्यक्ति नियमित रूप से विगत 80 वर्ष से साधना करते आ रहे हैं। यह तपस्या पारंपरिक अर्थों में पर्वतों की कंदराओं में न होकर पार्थिव जगत में सामान्य मनुष्यों से सतत संपर्क साधते हुए पूर्ण की गई।


श्री अरविंद ने कई किताबे लिखीं। मूल रूप से फ्रांस की रहने वाली श्री मां को उनके विचारों और लेखनी को विश्व के सामने सुनियोजित ढंग से लाने का श्रेय जाता है। श्री मां एवं श्री अरविंदो पूर्ण योग के प्रणेता थे, जिसका अर्थ है जो भी काम किया जाए उसमें पूर्ण कौशल तथा पारंगतता प्राप्त करना ही पूर्ण योग है। इससे श्रीकृष्ण जैसे योगी 'योग: कर्म सु कोशलम' वाले आदर्श की याद भी आती है।

जीवन के अंतिम समय में भी श्री मां ने इनकी बहुत सहायता की। 5 दिसंबर 1950 को श्री अरबिंदो इस संसार को छोड़ कर चले गए।








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